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    Home»देश - विदेश»चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलें बनाम अमेरिकी ‘गोल्डन डोम’: क्या पेंटागन का सुरक्षा कवच साबित होगा नाकाम?
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    चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलें बनाम अमेरिकी ‘गोल्डन डोम’: क्या पेंटागन का सुरक्षा कवच साबित होगा नाकाम?

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharyApril 18, 2026465 Views
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    पेंटागन की रणनीतिक योजनाओं में ‘गोल्डन डोम’ का नाम इन दिनों सबसे ऊपर है। यह केवल एक मिसाइल डिफेंस सिस्टम नहीं, बल्कि अमेरिका की वह महत्वाकांक्षी रक्षा दीवार है जिसे चीन और रूस की बढ़ती सैन्य ताकत के जवाब में तैयार किया जा रहा है। अमेरिका का लक्ष्य एक ऐसा एकीकृत सुरक्षा कवच बनाना है जो अंतरिक्ष से लेकर जमीन तक फैला हो। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘डोम’ चीन की नई पीढ़ी की हाइपरसोनिक मिसाइलों के सामने टिक पाएगा या नहीं, यह वर्तमान में वैश्विक सुरक्षा का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बना हुआ है।

    चीन की DF-17 और DF-27 जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें इस समय पेंटागन के ‘गुरूर’ के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही हैं। इन मिसाइलों की गति ध्वनि की रफ्तार से पांच गुना ज्यादा (Mach 5+) है, लेकिन उनकी सबसे खतरनाक खूबी उनकी ‘मैन्युवरेबिलिटी’ यानी रास्ते में दिशा बदलने की क्षमता है। पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें एक तय रास्ते (पैराबोलिक पाथ) पर चलती हैं जिन्हें इंटरसेप्ट करना आसान होता है, जबकि चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलें रडार की पकड़ में आने से पहले ही अपना मार्ग बदलकर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में माहिर हैं।

    रणनीतिक जानकारों का तर्क है कि अमेरिका का ‘गोल्डन डोम’ कितना भी आधुनिक क्यों न हो, वह ‘सैचुरेशन अटैक’ (एक साथ दर्जनों मिसाइलों का हमला) के सामने बेबस हो सकता है। यदि चीन एक साथ कई दिशाओं से अपनी हाइपरसोनिक मिसाइलें दागता है, तो दुनिया का कोई भी डिफेंस सिस्टम हर एक खतरे को पहचानकर उसे हवा में नष्ट नहीं कर पाएगा। इसी तकनीकी खामी को चीन अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रहा है और दावा कर रहा है कि उसकी मिसाइलें अमेरिकी डिफेंस की धज्जियां उड़ा देंगी।

    दूसरी ओर, अमेरिका इस खतरे से निपटने के लिए अंतरिक्ष आधारित सेंसर और ‘लो-अर्थ ऑर्बिट’ उपग्रहों का एक विशाल जाल बिछाने पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है। पेंटागन का मानना है कि यदि मिसाइल को उसके उड़ान भरने के शुरुआती सेकंडों में ही ट्रैक कर लिया जाए, तो उसे रोका जा सकता है। लेकिन यहाँ चुनौती आर्थिक भी है; एक हाइपरसोनिक मिसाइल को नष्ट करने वाले इंटरसेप्टर की लागत मिसाइल की खुद की लागत से कई गुना अधिक होती है, जो लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में अमेरिका के लिए वित्तीय बोझ बन सकती है।

    एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच, यह केवल हथियारों की नहीं बल्कि ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ की भी बात है। चीन अपनी मिसाइल क्षमता का प्रदर्शन करके यह संदेश देना चाहता है कि अमेरिकी विमानवाहक पोत (Aircraft Carriers) अब सुरक्षित नहीं हैं। वहीं, अमेरिका ‘गोल्डन डोम’ के जरिए अपने सहयोगियों को यह भरोसा दिलाना चाहता है कि वह अभी भी रक्षा तकनीक के शिखर पर है। यह होड़ शीत युद्ध के दौरान की ‘स्टार वॉर्स’ प्रतिस्पर्धा की याद दिलाती है, जहाँ तकनीक ही असली महाशक्ति का फैसला करती थी।

    रक्षा विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी कहता है कि कोई भी रक्षा प्रणाली 100% अभेद्य नहीं होती। इतिहास गवाह है कि जब-जब एक मजबूत ढाल बनाई गई है, उसे भेदने के लिए और भी नुकीला भाला तैयार किया गया है। चीन की हाइपरसोनिक तकनीक फिलहाल उस ‘भाले’ का काम कर रही है जिसने अमेरिका को अपनी रक्षा नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। पेंटागन के लिए अब चुनौती सिर्फ ‘डोम’ बनाना नहीं, बल्कि उसे चीन की ‘अनप्रेडिक्टेबल’ मिसाइलों के खिलाफ कारगर साबित करना है।

    अंततः, यह मुकाबला भविष्य के युद्धों की दिशा तय करेगा। यदि ‘गोल्डन डोम’ विफल होता है, तो वैश्विक सैन्य संतुलन पूरी तरह से बदल सकता है। लेकिन यदि अमेरिका सफलतापूर्वक इस तकनीक को तैनात कर लेता है, तो चीन का मिसाइल दबदबा कम हो जाएगा। फिलहाल, पेंटागन और बीजिंग के बीच यह ‘बिल्ली-चूहे का खेल’ जारी है, जिसमें दांव पर दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों का वर्चस्व लगा हुआ है।

    Brijesh Choudhary
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