पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुए संशोधन ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। SIR (Service Identification & Revision) प्रक्रिया के तहत करीब 50 लाख से अधिक लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, जिसे लेकर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच सीधा टकराव शुरू हो गया है। जहाँ ममता बनर्जी की सरकार इसे चुनाव से पहले वोटिंग समीकरण बिगाड़ने की एक सोची-समझी साजिश बता रही है, वहीं भाजपा इसे केवल एक प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा करार दे रही है।
इस विवाद के बीच ममता सरकार ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन शीर्ष अदालत से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। कोर्ट को दी गई जानकारी के अनुसार, मतदाता सूची से नाम काटे जाने के खिलाफ अब तक 34 लाख 35 हजार 174 अपीलें दायर की जा चुकी हैं। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि 23 अप्रैल को मतदान होना है, ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बिना किसी समाधान के छोड़ना उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि मतदान की तारीख बेहद करीब होने के कारण फिलहाल इन लोगों को वोट डालने की अनुमति देना मुमकिन नहीं है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत ऐसी स्थिति पैदा नहीं कर सकती जिससे अपीलीय ट्रिब्यूनल के जजों पर काम का भारी बोझ बढ़ जाए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि बिना उचित सत्यापन के मतदान की इजाजत दी गई, तो इससे पूरी चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल उठ सकते हैं। राज्य सरकार की ओर से पैरवी कर रहे कल्याण बनर्जी ने कोर्ट में भावुक अपील करते हुए कहा कि बंगाल के लाखों लोग न्याय की उम्मीद में अदालत की ओर देख रहे हैं और वे अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहते हैं।
अदालत में कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा भेजी गई एक रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक लाखों आपत्तियों में से केवल 6,675 दावों का ही निपटारा हो सका है, जबकि हजारों मामले तकनीकी कारणों से अटके हुए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने तीन सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की एक विशेष समिति का गठन किया है, जो ट्रिब्यूनल द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और अपीलों के निपटारे की निगरानी करेगी ताकि भविष्य में प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सके।
राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे ने ध्रुवीकरण तेज कर दिया है। टीएमसी का तर्क है कि 22 अप्रैल तक जिन भी मतदाताओं की अपील स्वीकार कर ली जाती है, उन्हें कम से कम वोट डालने का अवसर मिलना चाहिए। पार्टी का आरोप है कि जानबूझकर एक वर्ग विशेष के नाम लिस्ट से हटाए गए हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और केंद्र सरकार इसे लिस्ट के शुद्धिकरण की कवायद बता रहे हैं। इस खींचतान के बीच आम जनता में असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि क्या वे आने वाले चरणों में अपने वोट की ताकत दिखा पाएंगे या नहीं।
सुरक्षा के मोर्चे पर भी सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने भारत सरकार, निर्वाचन आयोग और राज्य प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि इस संवेदनशील प्रक्रिया में शामिल न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा में कोई चूक नहीं होनी चाहिए। अधिकारियों की सुरक्षा को किसी भी स्थिति में वापस न लेने का आदेश देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया को बिना किसी डर या दबाव के पूरा किया जाना अनिवार्य है। फिलहाल, 34 लाख से अधिक लोगों का भविष्य अब ट्रिब्यूनल और समिति के फैसलों पर टिका हुआ है।

