ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव को खत्म करने के लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर द्वारा की गई मध्यस्थता की कोशिशों को गहरा झटका लगा है। अमेरिका के एक पन्ने के शांति प्रस्ताव पर ईरान के कड़े रुख ने मुनीर की साख और पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका द्वारा थोपी गई शर्तों पर किसी भी सूरत में झुकने को तैयार नहीं है, जिसके बाद अब वार्ता का केंद्र इस्लामाबाद से हटकर दोहा (कतर) स्थानांतरित हो गया है।
इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका ने अपने प्रस्ताव में शर्त रखी थी कि ईरान को अपने यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) के प्रमुख ठिकानों को पूरी तरह नष्ट करना होगा। ईरान ने इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया है। ईरान के इस जवाबी रुख के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस प्रस्ताव को ‘अस्वीकार्य’ करार दिया, जिससे दोनों देशों के बीच युद्ध का खतरा एक बार फिर मंडराने लगा है।
पाकिस्तान की नाकामी के बाद कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल-थानी अचानक सक्रिय हो गए हैं। अल-थानी ने शांति का रास्ता तैयार करने के लिए सीधे अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क साधा है। इसी सिलसिले में उन्होंने अमेरिका के मियामी में उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस, वार्ता दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के करीबी सलाहकार जेरेड कुशनेर के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की। इस बैठक का उद्देश्य ईरान के लिए एक ऐसा नया फॉर्मूला तैयार करना है, जिसे तेहरान स्वीकार कर सके।
कतर की यह कोशिश बेहद महत्वपूर्ण समय पर हो रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 13 से 15 मई तक चीन का दौरा प्रस्तावित है। अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि इस दौरे से पहले ईरान के साथ कम से कम ‘एक पन्ने के समझौते’ पर सहमति बन जाए। यदि ऐसा होता है, तो ट्रंप इसे अपनी बड़ी वैश्विक जीत के रूप में पेश कर सकेंगे। यही कारण है कि कतर के प्रधानमंत्री अब मियामी से सीधे ईरानी नेताओं के साथ संवाद स्थापित करने की तैयारी में हैं।
मध्यस्थ के रूप में कतर की साख पाकिस्तान के मुकाबले कहीं अधिक मजबूत मानी जाती है। कतर के पास अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने का एक लंबा और सफल इतिहास है। 2021 में जब अमेरिका अफगानिस्तान के युद्ध में बुरी तरह फंसा हुआ था, तब कतर ने ही तालिबान और अमेरिका के बीच बातचीत का मंच तैयार किया और अमेरिकी सेना की सुरक्षित वापसी का रास्ता साफ किया। इसके अलावा वेनेजुएला के संकट में भी कतर की मध्यस्थता ने ही बर्फ पिघलाने का काम किया था।
ईरान के नजरिए से देखें तो खाड़ी देशों में कतर ही एकमात्र ऐसा देश है जिस पर वह भरोसा करता है। मौजूदा क्षेत्रीय तनाव के बावजूद ईरान ने कभी भी कतर को निशाना नहीं बनाया, जबकि वहां कई प्रमुख अमेरिकी सैन्य बेस मौजूद हैं। ईरान और कतर के बीच साझा गैस क्षेत्रों और गहरे व्यापारिक हितों के कारण तेहरान, अल-थानी की बातों को अधिक गंभीरता से सुनता है। इसी भरोसे के दम पर कतर अब इस नामुमकिन दिख रही डील को मुमकिन बनाने में जुटा है।
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति एक कूटनीतिक हार की तरह देखी जा रही है। जनरल असीम मुनीर ने पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच सेतु बनने की कोशिश की थी ताकि पाकिस्तान की गिरती अर्थव्यवस्था को अमेरिकी मदद मिल सके। लेकिन ईरान के सख्त परमाणु रुख और अमेरिका की बेचीली शर्तों के बीच पाकिस्तान का दबदबा फीका पड़ गया। अब दुनिया की निगाहें कतर के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या वह ईरान को परमाणु संवर्धन की शर्तों पर लचीला रुख अपनाने के लिए मना पाता है या नहीं।
फिलहाल, मियामी से तेहरान तक का कूटनीतिक गलियारा बेहद गर्म है। जेरेड कुशनेर और जेडी वेंस के साथ अल-थानी की चर्चाओं के बाद अब एक संशोधित प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। अगर अगले 48 घंटों में ईरान की ओर से कोई सकारात्मक संकेत मिलता है, तो ट्रंप के चीन दौरे से पहले एक ऐतिहासिक घोषणा की उम्मीद की जा सकती है। अन्यथा, मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन और अधिक अस्थिर होने की आशंका है, जिसका असर वैश्विक तेल बाजार और सुरक्षा पर पड़ेगा।

