न्यूयॉर्क स्थित अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार न्यायालय (US Court of International Trade) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों को एक बड़ा झटका देते हुए उनके द्वारा लगाए गए 10% वैश्विक टैरिफ (Global Tariff) को अवैध और “अनधिकृत” घोषित कर दिया है। तीन जजों के पैनल ने 2-1 के बहुमत से यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ने इन करों को लागू करने के लिए कांग्रेस द्वारा सौंपी गई शक्तियों की मर्यादा का उल्लंघन किया है। यह फैसला विशेष रूप से उन छोटे व्यवसायों और राज्यों के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है जो पिछले कई महीनों से इन करों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।
यह कानूनी विवाद इस साल फरवरी में तब शुरू हुआ था जब ट्रंप प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके पुराने भारी-भरकम टैरिफ को रद्द किए जाने के बाद एक वैकल्पिक 10% ‘टेंपरेरी’ ग्लोबल टैरिफ लागू किया था। इन नए करों को 1974 के ट्रेड एक्ट (सेक्शन 122) के तहत लगाया गया था। प्रशासन का तर्क था कि ये कर व्यापार संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि 1970 के दशक का यह पुराना कानून राष्ट्रपति को इस तरह के व्यापक और स्थायी प्रभाव वाले टैक्स लगाने की अनुमति नहीं देता है।
अदालत का यह आदेश वर्तमान में सभी आयातकों के लिए नहीं, बल्कि विशेष रूप से उन पक्षों के लिए है जिन्होंने इसे चुनौती दी थी। कोर्ट ने वाशिंगटन राज्य और दो निजी कंपनियों—मसाला विक्रेता ‘Burlap & Barrel’ और खिलौना निर्माता ‘Basic Fun’—के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को निर्देश दिया है कि इनसे वसूला गया टैरिफ 5 दिनों के भीतर रिफंड किया जाए। हालांकि, अन्य 24 आयातकों को फिलहाल इस राहत के दायरे से बाहर रखा गया है, लेकिन इस फैसले ने भविष्य के मुकदमों के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर दिया है।
इस पूरे मामले की जड़ें पिछले साल के उस घटनाक्रम में हैं जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा 100 से अधिक देशों पर लगाए गए डबल-डिजिट टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया था। 6-3 के बहुमत वाले उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रपति “आपातकालीन शक्तियों” का हवाला देकर मनमाने ढंग से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। उस समय ट्रंप प्रशासन पर यह आरोप भी लगा था कि उन्होंने टैरिफ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर कई देशों को मजबूरन ट्रेड डील करने पर विवश किया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” व्यापार नीति की कानूनी सीमाओं को रेखांकित करता है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि कर लगाने का प्राथमिक अधिकार अमेरिकी संविधान के तहत कांग्रेस के पास सुरक्षित है, न कि कार्यपालिका के पास। हालांकि, स्टील, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर लगे विशिष्ट टैरिफ अभी भी प्रभावी रहेंगे क्योंकि वे अलग कानूनी धाराओं के तहत आते हैं और सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान आदेश की परिधि में नहीं हैं।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह फैसला डेमोक्रेट शासित राज्यों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। कुल 24 राज्यों ने इन करों को चुनौती दी थी, जिनका तर्क था कि 24 फरवरी से लागू हुए ये टैक्स छोटे व्यवसायों की कमर तोड़ रहे हैं और आम उपभोक्ताओं के लिए महंगाई बढ़ा रहे हैं। कोर्ट के इस रुख से ट्रंप प्रशासन की उन योजनाओं पर पानी फिरता नजर आ रहा है जिसके तहत वे विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भारी शुल्क का सहारा ले रहे थे।
भविष्य की बात करें तो अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) के पास इस फैसले को ‘यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स’ में चुनौती देने का विकल्प मौजूद है। गौरतलब है कि अपील कोर्ट ने पिछले टैरिफ विवादों में भी अक्सर प्रशासन के खिलाफ और कानून की सख्त व्याख्या के पक्ष में ही फैसले दिए हैं। चूंकि ये 10% टैरिफ वैसे भी 24 जुलाई 2026 को समाप्त होने वाले थे, इसलिए प्रशासन अब यह तय करेगा कि वह इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाएगा या किसी नए विधायी रास्ते की तलाश करेगा।
कुल मिलाकर, यह अदालती आदेश न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। एक तरफ जहां ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ बढ़ते तनाव और वैश्विक व्यापार युद्ध में उलझा है, वहीं घरेलू अदालतों से मिल रही यह चुनौतियां उनकी नीतियों की स्थिरता पर सवाल खड़े करती हैं। इस फैसले के बाद वैश्विक बाजारों में एक सकारात्मक संदेश गया है कि अमेरिकी न्यायपालिका राष्ट्रपति की आर्थिक शक्तियों पर अंकुश लगाने में सक्षम है।


