सुप्रीम कोर्ट ने देश में होने वाली जाति आधारित जनगणना को रोकने का निर्देश देने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने न केवल याचिका को विचार के अयोग्य माना, बल्कि याचिका में इस्तेमाल की गई शब्दावली पर भी गहरी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में भाषा की मर्यादा का पालन अनिवार्य है और इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर बिना ठोस आधार के अदालत का समय बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि याचिका में जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया गया है, वह पूरी तरह से “अमर्यादित और बदतमीजी” से भरी है। अदालत ने तीखे सवाल पूछते हुए कहा, “आपने अपनी याचिका में ऐसी अभद्र भाषा क्यों लिखी है और इसे किससे लिखवाया है?” न्यायमूर्ति ने जोर देकर कहा कि एक कानून की जानकारी रखने वाले व्यक्ति या बार के सदस्य से यह उम्मीद की जाती है कि वह किसी भी मुद्दे को विश्लेषणात्मक और गरिमापूर्ण तरीके से पेश करे।
अदालत ने याचिकाकर्ता को नसीहत देते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया का पालन करने का एक व्यवस्थित तरीका होता है। पीठ ने कहा कि यदि किसी को सरकार की नीतियों या प्रक्रिया से कोई आपत्ति है, तो पहले संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराना चाहिए। जब अधिकारियों के स्तर पर कोई समाधान न निकले, तभी अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। सीधे कोर्ट आकर जनहित याचिकाओं के जरिए नीतियों को चुनौती देना, विशेषकर अपमानजनक भाषा के साथ, स्वीकार्य नहीं है।
इस याचिका में न केवल जनगणना को रोकने की मांग थी, बल्कि इसमें केंद्र सरकार को ‘एकल संतान’ वाले परिवारों के लिए आर्थिक प्रोत्साहन की नीतियां बनाने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था। पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे, ने याचिका के इन पहलुओं को अप्रासंगिक मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि नीति निर्माण सरकार का कार्यक्षेत्र है और उसमें अदालती हस्तक्षेप की एक सीमा होती है।
उल्लेखनीय है कि 2027 में होने वाली 16वीं राष्ट्रीय जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक होने वाली है। यह 1931 के बाद पहली ऐसी जनगणना होगी जिसमें जाति आधारित व्यापक आंकड़े दर्ज किए जाएंगे। इसके साथ ही, यह भारत की पहली पूर्ण डिजिटल जनगणना भी होगी, जिसमें डेटा संग्रह और सत्यापन के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी जाति जनगणना की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया था।
न्यायालय के इस कड़े रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि भविष्य में ऐसी जनहित याचिकाएं जो बिना उचित कानूनी आधार के और अमर्यादित भाषा में दायर की जाएंगी, उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने याचिकाकर्ता को भविष्य में अधिक समझदारी और कानूनी मर्यादा बनाए रखने की हिदायत देते हुए मामले को पूरी तरह बंद कर दिया है।

