अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने तेवर कड़े करते हुए चीन को सीधी चेतावनी दी है। शनिवार, 11 अप्रैल 2026 को फ्लोरिडा के लिए रवाना होते समय पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यदि बीजिंग ने ईरान को हथियारों की आपूर्ति जारी रखी, तो चीन को “बहुत बड़ी समस्याओं” का सामना करना पड़ेगा। ट्रंप का यह बयान उन खुफिया रिपोर्टों के बाद आया है जिनमें दावा किया गया है कि चीन, ईरान को आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली और घातक मिसाइलें भेजने की योजना बना रहा है।
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ईरान अपनी सैन्य शक्ति को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रहा है, जो हाल के संघर्षों में काफी कमजोर हो चुकी है। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायु सेना अब लगभग खत्म हो चुकी है और उनके शीर्ष नेतृत्व को भारी नुकसान पहुंचा है। ऐसे में चीन द्वारा दी जाने वाली कोई भी सैन्य सहायता न केवल मध्य पूर्व में अमेरिकी हितों को खतरे में डालेगी, बल्कि वर्तमान में जारी नाजुक संघर्ष विराम (Ceasefire) को भी अस्थिर कर सकती है।
इस चेतावनी के साथ ट्रंप ने भारी आर्थिक दंड का भी संकेत दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जो भी देश ईरान के सैन्य पुनर्निर्माण में मदद करेगा, उस पर अमेरिका 50% तक का व्यापारिक टैरिफ (Tariff) लगा सकता है। चूंकि चीन का एक बड़ा व्यापारिक हिस्सा अमेरिका पर निर्भर है, इसलिए यह आर्थिक प्रहार चीनी अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत इसे बीजिंग पर दबाव बनाने के एक बड़े हथियार के रूप में देखा जा रहा है।
यह तनावपूर्ण स्थिति ऐसे समय में पैदा हुई है जब अगले महीने राष्ट्रपति ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन होने वाला है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन ने ईरान को हथियारों की खेप भेजी, तो यह बैठक रद्द हो सकती है या इसमें केवल कड़वाहट ही देखने को मिलेगी। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वे व्यापारिक रिश्तों से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देंगे।
दूसरी ओर, चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। वाशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने इसे “निराधार अटकलें” बताते हुए कहा कि चीन संघर्ष में किसी भी पक्ष को हथियार उपलब्ध नहीं करा रहा है। हालांकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस बात पर अड़ी हैं कि ईरान को मिलने वाले ‘MANPADS’ और अन्य रक्षा उपकरणों के पीछे चीनी कंपनियों का हाथ है।
फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें बीजिंग के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या चीन ट्रंप की इस धमकी के आगे झुकेगा या ईरान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को बरकरार रखते हुए अमेरिका के साथ एक नए ‘ट्रेड वॉर’ और कूटनीतिक टकराव का जोखिम उठाएगा? आने वाले कुछ हफ्ते वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं।

