पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों ‘समृद्धि यात्रा’ और उसके बाद उभरे घटनाक्रमों ने सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट को एक ठोस आधार दे दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हालिया बयानों और शारीरिक संकेतों (बॉडी लैंग्वेज) ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अब अपनी राजनीतिक विरासत को एक नई दिशा में सौंपने की तैयारी कर चुके हैं। सम्राट चौधरी के कंधे पर हाथ रखकर बार-बार उन्हें भविष्य के काम सौंपने की बात कहना, केवल एक गठबंधन सहयोगी के प्रति सद्भाव नहीं, बल्कि एक सोची-समझी उत्तराधिकार योजना का हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार अब सक्रिय चुनावी राजनीति से हटकर एक ‘मार्गदर्शक’ की भूमिका में आना चाहते हैं। उनके राज्यसभा जाने की अटकलों ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है। यदि नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में जाते हैं, तो बिहार में मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा की ओर से सम्राट चौधरी सबसे मजबूत चेहरे के रूप में उभरे हैं। वे न केवल भाजपा के प्रदेश नेतृत्व में मजबूत पकड़ रखते हैं, बल्कि कोइरी (कुशवाहा) समुदाय के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते हैं, जो बिहार में चुनावी जीत के लिए अनिवार्य है।
बिहार में ‘लव-कुश’ (कुर्मी और कोइरी) समीकरण दशकों से नीतीश कुमार की ताकत रहा है। अब सत्ता के नए खाके में इस समीकरण को और अधिक विस्तार दिया जा रहा है। कोइरी समाज से आने वाले सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री के तौर पर आगे बढ़ाकर भाजपा और जदयू इस बड़े वोट बैंक को पूरी तरह साधने की कोशिश में हैं। कोइरी और कुर्मी जातियों की करीब 8 प्रतिशत आबादी मिलकर राज्य की सत्ता का संतुलन बदलने की क्षमता रखती है, जिसे 2025 के चुनावों के मद्देनजर सबसे सुरक्षित दांव माना जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा उलटफेर नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की सक्रिय राजनीति में एंट्री से हुआ है। लंबे समय तक राजनीति से दूर रहने के बाद, 8 मार्च को उनका जदयू जॉइन करना यह संकेत देता है कि पार्टी के अंदर पीढ़ीगत बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। गलियारों में चर्चा तेज है कि यदि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बनते हैं, तो निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाकर ‘लव-कुश’ की जोड़ी को सत्ता के शीर्ष पर बिठाया जा सकता है। इससे जदयू के कार्यकर्ताओं में यह संदेश जाएगा कि पार्टी का नेतृत्व सुरक्षित हाथों में है।
पटना के चाणक्य होटल में हुई सम्राट चौधरी और निशांत कुमार की पहली मुलाकात ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। हालांकि इसे एक निजी कार्यक्रम में हुई शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों के लिए दो उभरते हुए ध्रुवों का एक साथ दिखना भविष्य की गठबंधन सरकार की पहली झलक जैसा है। यह मुलाकात भाजपा और जदयू के बीच नए तालमेल और सत्ता के साझा फार्मूले की ओर इशारा करती है, जिसमें दोनों दलों के हितों का संतुलन बनाया गया है।
इतिहास के नजरिए से देखें तो यह एक दिलचस्प संयोग भी होगा। यदि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बनते हैं, तो वे सतीश प्रसाद सिंह के बाद इस समाज से दूसरे मुख्यमंत्री होंगे। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही नेताओं ने अपने करियर की शुरुआत खगड़िया के परबत्ता से की थी। वहीं दूसरी ओर, विपक्ष इस पूरी कवायद को भाजपा द्वारा जदयू के आधार को धीरे-धीरे समाहित करने की रणनीति के रूप में देख रहा है। राजद का मानना है कि यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि राज्य के असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है।
फिलहाल, बिहार की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है जहां सस्पेंस और रणनीतियां एक साथ चल रही हैं। जदयू और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भले ही अभी औपचारिक घोषणा से बच रहा हो, लेकिन सम्राट चौधरी की बढ़ती स्वीकार्यता और निशांत कुमार की सक्रियता ने बिहार में एक ‘नई राजनीतिक पारी’ की पटकथा लिख दी है। अगले कुछ महीनों में होने वाले संगठनात्मक बदलाव और कैबिनेट विस्तार इस बात पर अंतिम मुहर लगा देंगे कि बिहार की कमान अब किसके हाथों में होगी।

