पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) से अपना करीब दस साल पुराना नाता तोड़कर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दामन थाम लिया है। रविवार को कोलकाता स्थित टीएमसी कार्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। उन्हें टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद और राज्य के मंत्री ब्रात्य बसु ने औपचारिक रूप से पार्टी का झंडा सौंपा और उनका स्वागत किया।
चंद्र बोस का यह कदम आगामी चुनावों से पहले भाजपा के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। साल 2016 के विधानसभा चुनाव में चंद्र बोस भाजपा के एक प्रमुख चेहरे थे, जब उन्होंने खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। हालांकि, उस चुनाव में उन्हें जीत हासिल नहीं हुई थी, लेकिन भाजपा ने उन्हें नेताजी की विरासत से जोड़ने वाले एक महत्वपूर्ण चेहरे के रूप में पेश किया था। अब उनके पाला बदलने से राज्य में राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।
पार्टी बदलते ही चंद्र बोस ने भाजपा पर तीखे हमले किए। उन्होंने अपने पुराने फैसले पर पछतावा जताते हुए कहा कि भाजपा में शामिल होना उनकी एक बड़ी गलती थी, जिसे उन्होंने अब सुधार लिया है। बोस ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी देश के संविधान और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सिद्धांतों के विपरीत काम कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा के भीतर रहते हुए नेताजी की समावेशी विचारधारा और उनकी सोच के अनुरूप काम करना संभव नहीं था, क्योंकि पार्टी नेतृत्व इसकी अनुमति नहीं देता।
बोस ने देश की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताते हुए सांप्रदायिकता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारत की असली विरासत ‘सर्वधर्म समन्वय’ की है, लेकिन वर्तमान में धर्म के आधार पर राजनीति की जा रही है। उनके अनुसार, देश इस समय एक गहरे वैचारिक संकट से गुजर रहा है और इसके खिलाफ लड़ने के लिए सभी को एकजुट होने की जरूरत है। उन्होंने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए कहा कि आज के दौर में भवानीपुर से उन्हें हराना मुमकिन नहीं है।
तृणमूल कांग्रेस ने इस दलबदल को अपनी वैचारिक जीत के रूप में पेश किया है। टीएमसी नेताओं का मानना है कि चंद्र बोस के आने से पार्टी को न केवल राजनीतिक मजबूती मिलेगी, बल्कि बंगाली अस्मिता और स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान की लड़ाई में भी बढ़त हासिल होगी। भाजपा के पूर्व उम्मीदवार को अपनी ओर खींचकर टीएमसी ने चुनाव से पहले एक मजबूत मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश की है, जो मतदाताओं के बीच एक बड़ा संदेश भेज सकता है।
कुल मिलाकर, चंद्र कुमार बोस का तृणमूल में जाना बंगाल की राजनीति में ‘राष्ट्रवाद’ और ‘बंगाली पहचान’ की जंग को और तेज करेगा। जहाँ एक तरफ भाजपा नेताजी के नाम पर वोट बटोरने की कोशिश करती रही है, वहीं अब उन्हीं के परिवार के एक सदस्य द्वारा पार्टी पर लगाए गए आरोपों ने भाजपा को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है। अब देखना यह होगा कि आने वाले चुनावों में इस बड़े दलबदल का जमीन पर क्या असर पड़ता है।

