ईरान-इजरायल तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट ने भारत में महंगाई की नई लहर पैदा कर दी है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले ही दिन सरकारी तेल कंपनियों ने कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 195.50 रुपये की भारी बढ़ोतरी कर दी है। युद्ध की वजह से खाड़ी देशों से होने वाली तेल और गैस की सप्लाई ठप पड़ गई है, जिसका सीधा असर अब भारतीय बाजारों में कीमतों के उछाल के रूप में देखने को मिल रहा है।
देश के अलग-अलग महानगरों में इस बढ़ोतरी का व्यापक असर पड़ा है। राजधानी दिल्ली में अब 19 किलो वाला कमर्शियल सिलेंडर 2,078.50 रुपये का हो गया है। सबसे गंभीर स्थिति कोलकाता में है, जहाँ 218 रुपये की सर्वाधिक बढ़ोतरी के साथ दाम 2,208 रुपये तक जा पहुंचे हैं। मुंबई में नई कीमत 2,031 रुपये और चेन्नई में 2,246.50 रुपये के स्तर को छू रही है। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले महज चार महीनों के भीतर कीमतों में यह पांचवीं बार इजाफा किया गया है, जिससे व्यापारियों की लागत में इस साल अब तक लगभग 498 रुपये प्रति सिलेंडर की वृद्धि हो चुकी है।
इस मूल्य वृद्धि का सबसे गहरा प्रभाव खाद्य और सेवा उद्योग पर पड़ने की आशंका है। रेस्तरां, ढाबे, होटल और हलवाई जो बड़े पैमाने पर इन सिलेंडरों का उपयोग करते हैं, अब अपने मेनू कार्ड के दाम बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि कमर्शियल गैस महंगी होने से ‘इनपुट कॉस्ट’ बढ़ जाती है, जिसका अंतिम बोझ ग्राहकों की जेब पर ही पड़ता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है और सप्लाई चेन बहाल नहीं होती, तो आने वाले दिनों में लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी महंगाई का दबाव साफ़ दिखेगा।
आम गृहिणियों के लिए फिलहाल सुकून की खबर यह है कि घरेलू रसोई गैस (14.2 किलो) की कीमतों को स्थिर रखा गया है। दिल्ली में घरेलू सिलेंडर की कीमत अभी भी 913 रुपये है। हालांकि, बाजार में इस बात को लेकर चिंता बनी हुई है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बनी रहती हैं, तो सरकारी तेल कंपनियां लंबे समय तक घरेलू गैस के दामों को नियंत्रित नहीं रख पाएंगी। 7 मार्च को हुई पिछली बढ़ोतरी के बाद से मध्यम वर्ग पहले ही दबाव में है।
वैश्विक स्तर पर देखें तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ‘ऑयल चोक पॉइंट’ है, जहाँ से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है। ईरान युद्ध के चलते इसके बंद होने से न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर खतरा पैदा हो गया है। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में युद्ध की हर एक चिंगारी सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक की थाली को प्रभावित कर रही है। सरकार अब वैकल्पिक रूट और ऊर्जा के अन्य स्रोतों पर विचार कर रही है ताकि इस संकट के प्रभाव को कम किया जा सके।

