मध्य पूर्व में जारी संघर्ष अब वैश्विक कूटनीति के लिए गले की हड्डी बनता जा रहा है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी खींचतान के बीच अब यूरोपीय देश इटली ने इजरायल को एक बड़ा रणनीतिक झटका दिया है। इटली सरकार ने इजरायल के साथ अपने वर्षों पुराने रक्षा सहयोग समझौते को आधिकारिक तौर पर निलंबित करने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में इस समझौते का स्वतः नवीनीकरण करना संभव नहीं है, जिससे दोनों देशों के बीच दशकों पुराने रक्षा संबंध अब अधर में लटक गए हैं।
इस फैसले की जड़ में लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना (UNIFIL) पर हुए हमले हैं। इटली ने इजरायली सेना पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने लेबनान में तैनात इतालवी शांति सैनिकों के काफिले पर ‘चेतावनी’ के तौर पर गोलियां चलाईं। हालांकि इस घटना में किसी की जान नहीं गई और केवल एक वाहन क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन जी-7 के सदस्य देश इटली ने इसे अपनी संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय नियमों का अपमान माना। इसी के विरोध में इटली ने रोम में इजरायली राजदूत को तलब कर सख्त नाराजगी जताई थी।
इजरायल और इटली के बीच यह समझौता साल 2006 में हुआ था, जिसे हर पांच साल में अपग्रेड किया जाता था। इस समझौते के तहत दोनों देश रक्षा उद्योगों, सैन्य कर्मियों की उच्च शिक्षा, युद्ध प्रशिक्षण और उन्नत सूचना प्रौद्योगिकी (IT) जैसे क्षेत्रों में गहरा सहयोग करते थे। इटली के राजनयिक सूत्रों का कहना है कि लेबनान में नागरिकों और शांति दूतों पर हो रहे हमलों के बीच इजरायल के साथ सैन्य तकनीकी साझा करना अब “राजनीतिक रूप से असंभव” हो गया था।
तनाव की आग तब और भड़क गई जब इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने लेबनान दौरे के दौरान इजरायली सैन्य कार्रवाई की तीखी निंदा की। ताजानी ने लेबनानी नागरिकों पर किए जा रहे हमलों को “अस्वीकार्य” करार दिया और सोशल मीडिया पर अपनी एकजुटता व्यक्त की। जवाब में, इजरायल ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए यरूशलेम में इटली के राजदूत को तलब किया। इजरायल का तर्क है कि वह केवल अपनी सुरक्षा के लिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहा है, जबकि इटली ने इसे नागरिक आबादी पर हमला बताया है।
प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, जिन्हें अक्सर इजरायल का एक संतुलित सहयोगी माना जाता रहा है, उन्होंने इस बार कड़ा रुख अपनाकर दुनिया को चौंका दिया है। वेरोना में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने साफ कहा कि “मौजूदा स्थिति को देखते हुए सुरक्षा समझौते को आगे बढ़ाना संभव नहीं है।” यह बयान केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि इजरायल के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश है कि यूरोप अब सैन्य आक्रामकता को मूकदर्शक बनकर नहीं देखेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इटली का यह कदम अन्य यूरोपीय देशों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है। यदि फ्रांस और जर्मनी जैसे देश भी इसी तरह के कड़े फैसले लेते हैं, तो इजरायल के लिए रक्षा उपकरणों और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की राह कठिन हो जाएगी। इटली का यह फैसला न केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में एक बड़ी गिरावट है, बल्कि यह गाजा और लेबनान में बढ़ते मानवीय संकट के प्रति वैश्विक समुदाय के धैर्य के टूटने का संकेत भी है।
फिलहाल, इस निलंबन के बाद इजरायल और इटली के बीच रक्षा अनुसंधान और विकास के कई साझा प्रोजेक्ट रुक गए हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अन्य पश्चिमी देश भी इटली की राह पर चलते हैं या इजरायल अपने सहयोगियों को फिर से मनाने में कामयाब रहता है। फिलहाल, भूमध्य सागर के दोनों ओर राजनयिक संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं।

