मध्य पूर्व में शांति की कोशिशों को तब बड़ा झटका लगा जब अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिनों के युद्धविराम (सीजफायर) समझौते के बावजूद इजरायल ने लेबनान पर अपने हमले तेज कर दिए। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पहले ही साफ कर दिया था कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं होगा। पिछले कुछ दिनों में हुए इन ताबड़तोड़ हमलों में अब तक 254 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 1100 से अधिक लोग घायल हैं। मरने वालों में लेबनान के एक प्रमुख इमाम भी शामिल हैं, जिससे क्षेत्र में धार्मिक और राजनीतिक आक्रोश बढ़ गया है।
इजरायल की इस सैन्य कार्रवाई पर ईरान ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया के माध्यम से अमेरिका को चेतावनी दी है कि वह दोहरा रवैया नहीं अपना सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका को या तो पूर्ण युद्धविराम चुनना होगा या इजरायल के माध्यम से युद्ध जारी रखना होगा। ईरान ने धमकी दी है कि अगर लेबनान पर हमले तुरंत नहीं रुके, तो वह अमेरिका के साथ हुए 14 दिनों के सीजफायर समझौते को औपचारिक रूप से रद्द कर देगा।
जमीनी हमलों के जवाब में ईरान ने सामरिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग, ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) पर तेल टैंकरों की आवाजाही रोक दी है। स्थानीय मीडिया और ब्रिटिश अखबार ‘द गार्डियन’ के अनुसार, ईरानी नौसेना ने चेतावनी जारी की है कि तेहरान की अनुमति के बिना इस मार्ग से गुजरने वाले किसी भी जहाज को निशाना बनाकर तबाह कर दिया जाएगा। 8 अप्रैल की सुबह केवल दो टैंकरों को निकलने दिया गया, जिसके बाद से यह महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पूरी तरह बंद कर दिया गया है।
दूसरी ओर, हिज्बुल्लाह ने भी युद्धविराम को लेकर अपनी शर्तें सख्त कर दी हैं। संगठन का कहना है कि यदि इजरायल ने अपनी आक्रामकता कम नहीं की और लेबनान को सुरक्षा गारंटी नहीं मिली, तो समझौता किसी भी क्षण टूट सकता है। इजरायली रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने दावा किया है कि उनकी सेना ने बुधवार को लेबनान में हिज्बुल्लाह के सैकड़ों लड़ाकों और कमांड सेंटरों को निशाना बनाया है। उन्होंने इसे 2024 के ‘पेजर बम धमाकों’ के बाद हिज्बुल्लाह के लिए सबसे घातक प्रहार बताया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य की इस नाकेबंदी ने वैश्विक बाजार में हड़कंप मचा दिया है। चूंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग 20% हिस्सा इसी संकीर्ण रास्ते से होकर गुजरता है, इसलिए इस प्रतिबंध का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव जल्द नहीं सुलझा, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की भारी किल्लत और महंगाई का संकट पैदा हो सकता है।
फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका और ईरान के कूटनीतिक कदमों पर टिकी हैं। जहाँ एक तरफ सीजफायर की शर्तें दांव पर लगी हैं, वहीं दूसरी तरफ इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच बढ़ती सैन्य जंग ने मध्य पूर्व को एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि यह क्षेत्र शांति की ओर बढ़ेगा या फिर तेल संकट और युद्ध की एक नई विनाशकारी लहर का सामना करेगा।

