नई दिल्ली: देश को नक्सलवाद के दंश से पूरी तरह मुक्त करने के संकल्प के साथ केंद्र सरकार 30 मार्च को लोकसभा में एक ऐतिहासिक चर्चा करने जा रही है। यह चर्चा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा निर्धारित 31 मार्च की समय सीमा से ठीक एक दिन पहले हो रही है। इस सत्र के दौरान सरकार पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ‘प्रहार’ और अन्य बड़े ऑपरेशनों की सफलता का विस्तृत ब्योरा सदन के सामने रखेगी। गृह मंत्रालय का लक्ष्य इस चर्चा के माध्यम से यह संदेश देना है कि माओवादी नेटवर्क अब अपने अंत के करीब है।
हालिया महीनों में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व पर सीधा प्रहार किया है, जिससे संगठन की कमर टूट गई है। इसी कड़ी में 24 मार्च को छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ कमांडर पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ हथियार डाल दिए, जो सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत मानी जा रही है। इससे पूर्व 22 फरवरी को एक करोड़ रुपये के इनामी कमांडर देवजी के आत्मसमर्पण ने माओवादी खेमे में खलबली मचा दी थी। ये आत्मसमर्पण दर्शाते हैं कि नक्सली कैडरों का अपने नेतृत्व और विचारधारा से मोहभंग हो रहा है।
मैदानी मोर्चे पर भी सुरक्षा बलों को अभूतपूर्व सफलता मिली है। 22 जनवरी को झारखंड में 2.35 करोड़ रुपये के इनामी आतंकी पतराम मांझी उर्फ अनल को मार गिराया गया, जो 149 गंभीर मामलों में वांछित था। इसी तरह, दिसंबर 2025 में ओडिशा में झीरम घाटी हमले के मास्टरमाइंड और एक करोड़ के इनामी गणेश उइके का एनकाउंटर सुरक्षा बलों की एक बड़ी रणनीतिक उपलब्धि रही। बीजापुर और हजारीबाग जैसे इलाकों में भी लगातार हुए एनकाउंटर्स ने नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों (Safe Havens) को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

लोकसभा में होने वाली इस चर्चा का मुख्य केंद्र केवल सैन्य सफलताएँ ही नहीं, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों में हो रहा विकास भी होगा। सरकार सदन को बताएगी कि कैसे ‘विकास और सुरक्षा’ की दोहरी नीति ने माओवादियों के भर्ती आधार को कमजोर किया है। नए सुरक्षा कैंपों की स्थापना और सड़क-नेटवर्क के विस्तार ने सुरक्षा बलों की पहुँच उन इलाकों तक बना दी है, जिन्हें कभी ‘अभेद्य’ माना जाता था। अब सरकार का पूरा फोकस उन बचे हुए पॉकेट्स को साफ करने पर है जहाँ छिटपुट गतिविधियाँ जारी हैं।
इस चर्चा के बाद केंद्र सरकार नक्सलवाद के खिलाफ अपनी ‘अंतिम प्रहार’ की रणनीति को और तेज कर सकती है। गृह मंत्रालय की योजना प्रभावित राज्यों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने के तंत्र को और मजबूत करने और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास के लिए नई नीतियों की घोषणा करने की है। 30 मार्च की यह बहस तय करेगी कि आने वाले वर्षों में भारत कैसे आंतरिक सुरक्षा के इस सबसे पुराने खतरे से स्थायी रूप से निजात पाएगा।

