पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की कूटनीतिक सक्रियता ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। पिछले 48 घंटों के भीतर अराघची ने तीसरी बार पाकिस्तान का दौरा किया है, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक असाधारण घटना मानी जा रही है। रूस और ओमान जैसे महत्वपूर्ण देशों की यात्रा के तुरंत बाद उनका बार-बार इस्लामाबाद पहुंचना यह संकेत देता है कि ईरान और अमेरिका के बीच पर्दे के पीछे किसी बड़े समझौते या संदेश के आदान-प्रदान की तैयारी चल रही है।
वर्तमान में ईरान और अमेरिका के बीच औपचारिक रूप से ‘सीजफायर’ जैसी स्थिति बनी हुई है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच सीधे संवाद को लेकर अभी भी सस्पेंस बरकरार है। पर्दे के पीछे की इस बातचीत में पाकिस्तान एक ‘सेफ चैनल’ या मध्यस्थ की भूमिका निभाता दिख रहा है। अराघची का रूस से सीधे इस्लामाबाद पहुंचना इस बात की पुष्टि करता है कि तेहरान अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ-साथ पाकिस्तान के माध्यम से वाशिंगटन तक अपनी बात पहुँचाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।
तनाव का सबसे प्रमुख कारण सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) बना हुआ है। ईरान ने वैश्विक व्यापार के इस मुख्य रास्ते को खोलने के बदले अमेरिका के सामने एक कड़ी शर्त रखी है। ईरान का स्पष्ट कहना है कि यदि अमेरिका उस पर लगाए गए तमाम कड़े आर्थिक प्रतिबंधों को हटा लेता है और आर्थिक नाकेबंदी खत्म करता है, तभी वह होर्मुज से जहाजों की आवाजाही को सामान्य करेगा। ईरान इसे अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के आखिरी विकल्प के रूप में देख रहा है।
हालांकि, ईरान के इस प्रस्ताव पर अमेरिका का रुख बेहद सख्त बना हुआ है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की ‘होर्मुज शर्त’ को सिरे से खारिज करते हुए अपनी नाखुशी जाहिर की है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि वे दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करेंगे और ईरान को बिना किसी शर्त के अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों को खुला रखना चाहिए। ट्रंप के इस “नो डील” वाले रवैये ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है, जिससे अराघची की दौड़धूप और बढ़ गई है।
इस विवाद में अब संयुक्त राष्ट्र (UN) भी सीधे तौर पर कूद पड़ा है। महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने ईरान से अपील की है कि होर्मुज की जलसंधि को तत्काल और बिना किसी भेदभाव के खोला जाना चाहिए। गुटेरेस ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए किसी भी प्रकार का ‘टोल’ या प्रतिबंध स्वीकार्य नहीं है। यूएन का यह बयान ईरान पर नैतिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव को और बढ़ा देता है, जिससे उसे अपनी शर्तों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अराघची का पाकिस्तान दौरा इस गतिरोध को तोड़ने की एक नई कोशिश हो सकता है। यह माना जा रहा है कि रूस में पुतिन से विचार-विमर्श करने के बाद अराघची अब पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को कोई “नया और संशोधित प्रस्ताव” भेज सकते हैं। पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के साथ उनकी इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य ट्रंप प्रशासन को यह समझाना है कि तनाव कम करने के लिए दोनों तरफ से कदम उठाना अनिवार्य है।
ईरान की ओर से फिलहाल इन यात्राओं के उद्देश्यों पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन अराघची का ‘एक्टिव मोड’ में होना बताता है कि ईरान युद्ध के जोखिम के बजाय बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि, कूटनीतिक समीकरण हर पल बदल रहे हैं और “कभी हां, कभी ना” वाली स्थिति बनी हुई है। पूरी दुनिया की नजरें अब इस्लामाबाद से निकलने वाले अगले संदेश पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि खाड़ी क्षेत्र शांति की ओर बढ़ेगा या संघर्ष की ओर।
कुल मिलाकर, अब्बास अराघची की यह मैराथन कूटनीति इस बात का प्रमाण है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय अलगाव को कम करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। पाकिस्तान की धरती से अमेरिका को भेजा जाने वाला अगला प्रस्ताव यदि ट्रंप प्रशासन को रास आता है, तो जल्द ही होर्मुज में जहाजों के सायरन और वैश्विक बाजारों में राहत की खबर सुनी जा सकती है। अन्यथा, शर्तों का यह पुलिंदा भविष्य में और बड़े भू-राजनीतिक संकट का कारण बन सकता है।

