वनतारा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: सभी आरोप खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने ‘करणार्थम विरम फाउंडेशन’ की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें गुजरात के वनतारा (Vantara) प्रोजेक्ट पर वन्यजीव कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि संस्थान की गतिविधियों में किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं पाया गया है।
अदालत ने जस्टिस जे. चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली विशेष जांच टीम (SIT) की रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। 12 सितंबर 2025 को सौंपी गई इस रिपोर्ट में कहा गया था कि वन्यजीवों का आयात अंतरराष्ट्रीय संधि (CITES) के सभी नियमों और आवश्यक परमिट के साथ किया गया था।
कोर्ट ने साफ किया कि जानवरों का आयात किसी व्यापारिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि उनके संरक्षण और पुनर्वास के लिए किया गया था। पीठ के अनुसार, यदि आयात के समय सभी कानूनी प्रक्रियाएं वैध थीं, तो बाद में उन पर सवाल उठाकर उन्हें अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
यह विवाद कोल्हापुर के एक मठ से 32 वर्षीय हथिनी ‘माधुरी’ को वनतारा शिफ्ट किए जाने के बाद बढ़ा था। हालाँकि स्थानीय लोगों ने धार्मिक आधार पर इसका विरोध किया था, लेकिन कोर्ट ने PETA इंडिया द्वारा उठाई गई स्वास्थ्य चिंताओं और पशु कल्याण को प्राथमिकता देते हुए इस स्थानांतरण को सही माना।
याचिकाकर्ता ने वन्यजीव व्यापार की निगरानी के लिए एक नई राष्ट्रीय समिति बनाने की मांग भी की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया। अदालत का मानना है कि वर्तमान नियामक संस्थाएं और SIT की जांच इस मामले में पूरी तरह पर्याप्त हैं।
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद वनतारा को अपने पशु संरक्षण और पुनर्वास कार्यक्रमों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मजबूत कानूनी आधार मिल गया है। इससे भविष्य में वन्यजीवों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बचाव और उपचार के कार्यों को गति मिलेगी।

