भारतीय राजनीति के गलियारों में 27 अप्रैल 2026 की तारीख एक बड़े ऐतिहासिक और विवादित उलटफेर के रूप में दर्ज हो गई है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों ने आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। राज्यसभा के सभापति श्री सी.पी. राधाकृष्णन द्वारा इस विलय को मंजूरी दिए जाने के बाद संसद के ऊपरी सदन की राजनीति में जबरदस्त हलचल मच गई है। इस घटनाक्रम ने न केवल विपक्षी खेमे को झटका दिया है, बल्कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के संख्या बल को और अधिक मजबूती प्रदान की है।
इस विलय प्रक्रिया के तहत आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरे—राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सिंह साहनी अब भाजपा संसदीय दल का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। इन सांसदों के पाला बदलने से राज्यसभा में आम आदमी पार्टी की स्थिति बेहद कमजोर हो गई है। कल तक सदन में 10 सांसदों के साथ अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने वाली पार्टी अब मात्र 3 सांसदों के साथ एक छोटे से गुट में सिमट कर रह गई है।
इस बड़े घटनाक्रम पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपनी त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए इसे “लोकतंत्र की जीत” बताया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि सभापति द्वारा इस विलय को दी गई स्वीकृति का वे हार्दिक स्वागत करती हैं। रेखा गुप्ता ने दावा किया कि ये सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के संकल्प और उनके नेतृत्व से प्रभावित होकर भाजपा में शामिल हुए हैं। उन्होंने इस निर्णय को देश के विकास के लिए एक आवश्यक कदम करार दिया।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में पाला बदलने वाले सांसदों की सराहना करते हुए कहा कि झूठ और अराजक राजनीति को त्याग कर इन साथियों ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इन सात सांसदों का लंबा संसदीय अनुभव भाजपा के संसदीय दल को और अधिक ऊर्जा और शक्ति प्रदान करेगा। रेखा गुप्ता के अनुसार, इन नेताओं का भाजपा के साथ जुड़ना यह दर्शाता है कि विपक्षी दलों के भीतर नेतृत्व और विचारधारा को लेकर कितना गहरा असंतोष व्याप्त है।
दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय सिंह ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सभापति के निर्णय को “एकतरफा” बताते हुए आरोप लगाया कि सात सांसदों के प्रस्ताव को तो तुरंत स्वीकार कर लिया गया, लेकिन पार्टी द्वारा भेजे गए विरोध पत्र को नजरअंदाज किया गया। संजय सिंह ने स्पष्ट किया कि उन्होंने सभापति को पहले ही पत्र लिखकर इन सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन उस पर विचार नहीं किया गया।
संजय सिंह ने इस मामले में भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची यानी ‘दलबदल विरोधी कानून’ का हवाला दिया है। उनका तर्क है कि यदि कोई सांसद अपनी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और निर्देशों का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जानी चाहिए। हालांकि, संवैधानिक नियमों के अनुसार, यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य एक साथ विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता बच जाती है। चूंकि 10 में से 7 सांसदों ने पाला बदला है, इसलिए तकनीकी रूप से यह आंकड़ा दो-तिहाई (66%) के पार चला गया है, जो इस विलय के पक्ष में नजर आता है।
संजय सिंह का कहना है कि यह मुद्दा सिर्फ राजनीतिक लाभ-हानि का नहीं, बल्कि संवैधानिक गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों का है। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि आगामी सुनवाई में सभापति महोदय संविधान की रक्षा को प्राथमिकता देंगे और निष्पक्ष रूप से इस मामले की समीक्षा करेंगे। आप नेतृत्व का मानना है कि यह विलय अनैतिक है और इसे कानूनी रूप से चुनौती दी जानी चाहिए।
फिलहाल, इस विलय ने दिल्ली से लेकर पंजाब तक की राजनीति में भूचाल ला दिया है। भाजपा जहाँ इसे अपनी बढ़ती स्वीकार्यता के रूप में देख रही है, वहीं आम आदमी पार्टी इसे अपनी पार्टी को अस्थिर करने की साजिश बता रही है। आने वाले दिनों में यह मामला अदालत की चौखट तक पहुँच सकता है, जिससे राज्यसभा की कार्यवाही और दलबदल कानून की व्याख्या पर फिर से बहस छिड़ने की संभावना है।

