न्यूयॉर्क, 25 मार्च: मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने जहां पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया था, वहीं अब युद्ध विराम की संभावनाओं ने नई उम्मीद जगाई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान पर जारी हमलों में नरमी बरतने के संकेत दिए हैं। ट्रंप के अनुसार, वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत का दौर शुरू हो चुका है, हालांकि उन्होंने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वार्ता की मेज पर ईरान की ओर से कौन से प्रतिनिधि शामिल हैं।
दूसरी ओर, ईरान ने इस शांति वार्ता के लिए अमेरिका के सामने बेहद सख्त और रणनीतिक शर्तें रखी हैं। ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने साफ कर दिया है कि वह तभी पीछे हटेगा जब खाड़ी क्षेत्र में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद किया जाएगा। इसके अलावा, तेहरान ने मांग की है कि ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंधों को तुरंत हटाया जाए और हिज्बुल्लाह के खिलाफ जारी इजरायली सैन्य कार्रवाई को पूरी तरह रोका जाए। इन शर्तों में सबसे चौंकाने वाली मांग होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क वसूलने का अधिकार मांगना है, जो वैश्विक तेल व्यापार पर ईरान के प्रभुत्व को बढ़ा सकता है।
ईरान की मांगों की सूची लंबी है, जिसमें सुरक्षा और वित्तीय मुआवजे को प्राथमिकता दी गई है। ईरान चाहता है कि भविष्य में अमेरिका उस पर कभी हमला नहीं करेगा, इसकी एक अंतरराष्ट्रीय और ठोस गारंटी दी जाए। साथ ही, युद्ध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए भारी वित्तीय हर्जाने की मांग भी की गई है। तेहरान ने यह भी प्रस्ताव रखा है कि यदि उसकी शर्तें मानी जाती हैं, तो वह अगले पांच वर्षों तक अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने और यूरेनियम संवर्धन की गति को कम करने पर विचार कर सकता है।
परमाणु मुद्दे पर ईरान ने कुछ लचीला रुख दिखाते हुए 60% तक संवर्धित यूरेनियम के भंडार पर बातचीत करने और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति जताई है। इसके बदले में ईरान चाहता है कि एक नई समुद्री व्यवस्था लागू की जाए, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण मजबूत हो सके। साथ ही, ईरान ने क्षेत्र में सक्रिय अपने प्रॉक्सी समूहों को मिलने वाली फंडिंग को भी रोकने का आश्वासन दिया है, बशर्ते उसकी संप्रभुता का सम्मान किया जाए।
इस कूटनीतिक मोड़ से पहले ईरानी नेतृत्व का रुख काफी कड़ा था। 12 मार्च को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने रूस और पाकिस्तान के नेताओं से परामर्श के बाद स्पष्ट किया था कि युद्ध की समाप्ति तभी संभव है जब ईरान के ‘वैध अधिकारों’ को वैश्विक मान्यता मिले। इससे पहले विदेश मंत्री अब्बास अराघची सहित कई वरिष्ठ ईरानी राजनयिकों ने अमेरिका के साथ किसी भी बातचीत से इनकार कर दिया था। उनका तर्क था कि पिछले परमाणु समझौतों के दौरान अमेरिका ने ईरान के साथ विश्वासघात किया है, जिससे दोनों देशों के बीच विश्वास की भारी कमी पैदा हो गई है।
वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह साफ है कि शांति का रास्ता काफी चुनौतीपूर्ण है। जहां ट्रंप प्रशासन तनाव कम कर कूटनीति का रास्ता अपनाना चाहता है, वहीं ईरान अपनी शर्तों के जरिए क्षेत्र में अमेरिका और इजरायल के प्रभाव को न्यूनतम करने की कोशिश कर रहा है। आने वाले कुछ हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि क्या ये शर्तें किसी समझौते का आधार बनेंगी या मध्य पूर्व एक और बड़े संघर्ष की ओर बढ़ जाएगा।

