नई दिल्ली: भारतीय राजनीति आज एक ऐतिहासिक बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। केंद्र सरकार द्वारा बुलाए गए संसद के विशेष सत्र का आगाज़ हो चुका है, जिसका मुख्य उद्देश्य महिला आरक्षण को धरातल पर उतारना और संसदीय ढांचे में व्यापक बदलाव करना है। इस सत्र में मोदी सरकार तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश करने जा रही है, जो न केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाएंगे, बल्कि लोकसभा और विधानसभाओं की तस्वीर भी पूरी तरह बदल देंगे।
इस विशेष सत्र का सबसे बड़ा केंद्र ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को पूरी तरह लागू करना है। सरकार ने इसके लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक को पेश करने की तैयारी की है। इन विधेयकों के जरिए दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसी विधानसभाओं में भी महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का रास्ता साफ हो जाएगा।
प्रस्तावित बदलावों के अनुसार, लोकसभा में सांसदों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी होने वाली है। वर्तमान में सीटों की संख्या 543 है, जिसे बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसी तरह राज्यों की विधानसभाओं में कुल सीटों की संख्या 815 और केंद्र शासित प्रदेशों में 35 तक पहुंच जाएगी। इस विस्तार के बाद लोकसभा की 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, जो भारतीय संसदीय इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।
सदन की कार्यवाही के लिए समय का आवंटन भी कर दिया गया है। इन बिलों पर 16, 17 और 18 अप्रैल को सघन चर्चा होगी। लोकसभा में चर्चा के लिए कुल 18 घंटे तय किए गए हैं, जबकि राज्यसभा में 10 घंटे का समय आवंटित है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और गृह मंत्री अमित शाह इन बिलों को पेश करेंगे। सरकार को इन्हें पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, जिसके लिए भाजपा और कांग्रेस समेत सभी दलों ने व्हिप जारी कर अपने सांसदों की उपस्थिति अनिवार्य कर दी है।
हालांकि, इन विधेयकों को लेकर विपक्ष का रुख काफी कड़ा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर हुई 20 विपक्षी दलों की बैठक में सरकार की रणनीति का विरोध करने का निर्णय लिया गया। विपक्ष का मुख्य एतराज आरक्षण को परिसीमन (Delimitation) से जोड़ने पर है। राहुल गांधी समेत अन्य नेताओं का तर्क है कि महिला आरक्षण को वर्तमान की 543 सीटों के आधार पर ही 2029 से लागू किया जाना चाहिए, न कि सीटों की संख्या बढ़ाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
विपक्ष की सबसे बड़ी चिंता उत्तर और दक्षिण भारत के बीच बढ़ती राजनीतिक खाई को लेकर है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का मानना है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करने से दक्षिण भारतीय राज्यों का राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर कार्य किया है। उनके अनुसार, यह कदम राज्यों के बीच ‘भावनात्मक विभाजन’ पैदा कर सकता है। विपक्ष ने जनगणना रिपोर्ट में देरी और पुराने आंकड़ों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए हैं।
दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि परिसीमन के बाद किसी भी राज्य की सीटें घटेंगी नहीं, बल्कि सभी राज्यों में प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। सरकार इस कदम को समावेशी लोकतंत्र की ओर बढ़ाया गया हाथ बता रही है। परिसीमन को इस पूरी रणनीति का सबसे पेचीदा हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर राज्यों की सीटों के पुनर्निर्धारण से जुड़ा है।
2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में यह शर्त थी कि इसे नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू किया जाएगा। अब 2026 के इन संशोधनों के जरिए सरकार उस वादे को अमली जामा पहनाने की कोशिश कर रही है। यदि ये बिल पारित हो जाते हैं, तो 2029 का आम चुनाव नए परिसीमन और आरक्षित महिला सीटों के साथ लड़ा जाएगा।
कुल मिलाकर, संसद का यह विशेष सत्र केवल विधायी कार्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा। जहाँ एक तरफ आधी आबादी को उनका हक देने का उत्साह है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। अगले तीन दिनों तक संसद में होने वाली बहस यह तय करेगी कि भारत का नया लोकतांत्रिक स्वरूप कैसा होगा।

