नेपाल के नवनियुक्त प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन) जल्द ही अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा पर नई दिल्ली आ सकते हैं। प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें दिल्ली आने का औपचारिक निमंत्रण भेजा था, जिसे बालेन शाह ने सहर्ष स्वीकार कर लिया है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि दोनों देशों के बीच इस उच्च-स्तरीय यात्रा की रूपरेखा तैयार की जा रही है। यह दौरा न केवल कूटनीतिक शिष्टाचार है, बल्कि इसे दोनों पड़ोसी देशों के बीच रिश्तों को पुनः पटरी पर लाने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
बालेन शाह का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब नेपाल में एक बड़े राजनीतिक बदलाव की लहर चल रही है। एक युवा और गैर-पारंपरिक नेता के रूप में उभरे बालेन शाह नेपाल की पुरानी शासन व्यवस्था को ‘रीसेट’ करने के लिए जाने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बालेन शाह की विचारधारा केपी शर्मा ओली की तुलना में अधिक संतुलित और व्यावहारिक है। जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री ओली का झुकाव चीन की ओर अधिक था, वहीं बालेन शाह एक ‘न्यूट्रल’ छवि के साथ भारत और चीन दोनों के साथ समान दूरी और बेहतर संबंधों की वकालत करते नजर आ रहे हैं।
ऐतिहासिक रूप से नेपाल के प्रधानमंत्रियों की पहली विदेश यात्रा भारत की ही रही है, लेकिन केपी शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान इस परंपरा और द्विपक्षीय संबंधों में काफी कड़वाहट आ गई थी। ओली सरकार ने न केवल कालापानी और लिपुलेख जैसे विवादित क्षेत्रों को शामिल करते हुए नेपाल का नया नक्शा जारी किया था, बल्कि भगवान राम के जन्मस्थान को लेकर भी अनावश्यक बयानबाजी की थी। इन घटनाओं ने दशकों पुराने “रोटी-बेटी” के रिश्तों में दरार पैदा कर दी थी। अब बालेन शाह के सत्ता में आने से भारत को उम्मीद है कि उन विवादों को पीछे छोड़कर सहयोग के नए क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा।
काठमांडू और नई दिल्ली के अधिकारी इस यात्रा को केवल एक औपचारिक मुलाकात तक सीमित नहीं रखना चाहते। वर्तमान में दोनों पक्षों के बीच तकनीकी और राजनीतिक स्तर पर गहन ‘होमवर्क’ चल रहा है। इस बार मुख्य एजेंडा व्यापार, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सहयोग और लंबित विकास परियोजनाओं को गति देना है। अधिकारियों का मानना है कि यदि यह यात्रा सफल रहती है, तो यह दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी और नेपाल की पिछली सरकार द्वारा पैदा की गई कूटनीतिक दूरियों को पाटने का काम करेगी।
बालेन शाह के पास वर्तमान में एक ऐतिहासिक अवसर है। हालाँकि, उनके लिए पिछली सरकार की राष्ट्रवादी नीतियों को पूरी तरह खारिज करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन उनकी प्रशासनिक शैली और युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता उन्हें कठिन फैसले लेने की शक्ति देती है। भारत भी इस युवा नेतृत्व का स्वागत करने के लिए उत्साहित है, क्योंकि बालेन शाह ‘सॉफ्ट पावर’ और आधुनिक गवर्नेंस पर अधिक भरोसा करते हैं। दिल्ली में होने वाली द्विपक्षीय वार्ता से यह स्पष्ट हो जाएगा कि भविष्य में हिमालयी राष्ट्र नेपाल की विदेश नीति का ऊँट किस करवट बैठने वाला है।

