पाकिस्तान इन दिनों एक नए और हैरान करने वाले कारण से अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है। पाकिस्तान की पंजाब असेंबली में एक आधिकारिक प्रस्ताव पेश किया गया है, जिसमें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार को नोबेल शांति पुरस्कार देने की मांग की गई है। यह मांग अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए युद्धविराम (सीजफायर) में पाकिस्तान द्वारा निभाई गई कथित मध्यस्थता की भूमिका के बदले की जा रही है।
प्रस्ताव के अनुसार, जब मिडिल ईस्ट में तनाव अपने चरम पर था और अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध की स्थिति बन गई थी, तब पाकिस्तानी नेतृत्व ने सक्रिय कूटनीति का सहारा लिया। दावा किया जा रहा है कि शहबाज शरीफ ने डोनाल्ड ट्रंप से बात कर कूटनीतिक प्रयासों के लिए समय मांगा, जबकि जनरल आसिम मुनीर ने पर्दे के पीछे से सैन्य और राजनीतिक चैनलों के जरिए तनाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पाकिस्तानी नेताओं का मानना है कि उनकी इस ‘ऐतिहासिक’ पहल ने दुनिया को एक बड़े वैश्विक संकट और संभावित युद्ध से बचा लिया है।
समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान ने कई हफ्तों तक कड़ी मशक्कत की। 22 मार्च को पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने ट्रंप से और शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति से बातचीत की थी, जिसके बाद ट्रंप ने ईरान के गैस प्लांट पर हमले रोकने का फैसला किया। इसके बाद इशाक डार ने चीन, सऊदी अरब और तुर्किये जैसे देशों के साथ तालमेल बिठाया ताकि एक ठोस सीजफायर प्लान तैयार किया जा सके। 8 अप्रैल को जब ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर सीजफायर का ऐलान किया, तो पाकिस्तान ने इसका पूरा श्रेय अपने शीर्ष नेतृत्व को देना शुरू कर दिया।
हालांकि, इस घटनाक्रम में चीन की भूमिका को भी काफी अहम माना जा रहा है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अंतिम क्षणों में चीन ने ईरान पर आर्थिक दबाव बनाया था कि यदि युद्ध जारी रहा, तो वह तेल की खरीद बंद कर देगा। इस ‘वाइल्ड कार्ड एंट्री’ ने ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया। इसके बावजूद, पाकिस्तान की पंजाब असेंबली में पेश प्रस्ताव में सारा क्रेडिट शरीफ, मुनीर और डार को देते हुए उन्हें वैश्विक शांति का मसीहा बताने की कोशिश की गई है।
दूसरी तरफ, पाकिस्तान की इस मांग पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी देखने को मिल रही हैं। आलोचकों का कहना है कि जो देश खुद लंबे समय से आतंकवाद को पालने-पोसने के आरोपों और गंभीर आर्थिक बदहाली से जूझ रहा है, वहां के नेताओं के लिए शांति के नोबेल की मांग करना हास्यास्पद है। विशेषकर भारत में इस मांग को लेकर काफी तंज कसे जा रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान की छवि सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देश की रही है।
अंततः, यह प्रस्ताव पाकिस्तान की घरेलू राजनीति और उसकी खराब वैश्विक छवि को सुधारने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। भले ही पाकिस्तान ने सीजफायर में भूमिका निभाई हो, लेकिन नोबेल शांति पुरस्कार की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और कड़ी होती है। फिलहाल, इस मांग ने पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में तो हलचल पैदा कर दी है, लेकिन विश्व पटल पर इसे कितनी गंभीरता से लिया जाता है, यह अभी देखना बाकी है।

