अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दी गई ’48 घंटे’ की नई चेतावनी ने मध्य पूर्व में युद्ध की आशंकाओं को चरम पर पहुँचा दिया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि यदि ईरान उनकी शर्तों को स्वीकार नहीं करता है, तो अमेरिका ईरान के खिलाफ ऐसी सैन्य कार्रवाई करेगा जो पहले कभी नहीं देखी गई। इस ताज़ा अल्टीमेटम की समयसीमा आज समाप्त हो रही है, जिससे वैश्विक राजनीति में अनिश्चितता का माहौल गहरा गया है और दुनिया की नज़रें अब व्हाइट हाउस के अगले कदम पर टिकी हैं।
इस बार ट्रंप की धमकी केवल सामान्य सैन्य हमले तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने बेहद विशिष्ट और घातक रणनीति का संकेत दिया है। उन्होंने आने वाले दिनों को “Power Plant Day” और “Bridge Day” के रूप में संबोधित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा अर्थ यह है कि अमेरिका ईरान के बिजली घरों, महत्वपूर्ण पुलों और नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की योजना बना रहा है। यदि ऐसा होता है, तो ईरान की अर्थव्यवस्था और जनजीवन पूरी तरह ठप हो सकता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकार एक गंभीर मानवीय संकट के रूप में देख रहे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जिसे दुनिया की ‘तेल धमनी’ कहा जाता है, इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। ट्रंप ने हाल ही में विरोधाभासी बयान देते हुए कहा कि अमेरिका अब ऊर्जा के क्षेत्र में इतना शक्तिशाली है कि उसे इस रास्ते की आवश्यकता ही नहीं है। हालांकि, साथ ही उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ईरान द्वारा इस रास्ते को बाधित करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ट्रंप की इस ‘शॉक एंड ऑ’ (Shock and Awe) नीति ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में खलबली मचा दी है, जहाँ कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया जा रहा है।
पिछले एक महीने के घटनाक्रम पर गौर करें तो राष्ट्रपति ट्रंप की रणनीति ‘अत्यधिक दबाव’ बनाने की रही है। 1 मार्च से अब तक वे कई बार अपनी डेडलाइन बदल चुके हैं—कभी हमले को 5 दिन के लिए टालना, तो कभी 20 गुना ज़्यादा तबाही मचाने की धमकी देना। आलोचकों का तर्क है कि बार-बार समयसीमा बदलने और फिर पीछे हटने से अमेरिका की वैश्विक साख को नुकसान पहुँच रहा है। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ मान रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान को बिना युद्ध के ही एक नई परमाणु संधि की मेज पर लाना है।
ट्रंप का संदेश ईरान की जनता और वहां की सत्ता के लिए काफी अलग और भ्रमित करने वाला है। एक ओर वे ईरानी नागरिकों से अपनी सरकार के खिलाफ बगावत करने की अपील करते हैं और उन्हें ‘बेहतर भविष्य’ का सपना दिखाते हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान को पूरी तरह मटियामेट करने की धमकी देते हैं। इस दोहरी नीति के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अमेरिका के सहयोगी देश भी दुविधा में हैं कि ट्रंप वास्तव में किसी बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत करने वाले हैं या यह केवल उनके पुराने व्यापारिक सौदेबाजी का ही एक खतरनाक रूप है।
ईरान ने भी इस तनाव के बीच कड़ा रुख अख्तियार कर रखा है। ईरानी नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि उनकी सेना किसी भी आक्रामकता का जवाब देने के लिए ‘रेड अलर्ट’ पर है। उधर, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की है, क्योंकि ईरान और अमेरिका के बीच कोई भी सीधा टकराव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह एक वैश्विक संघर्ष का रूप ले सकता है। फिलहाल, ट्रंप की ’48 घंटे’ की घड़ी की सुइयां जैसे-जैसे आगे बढ़ रही हैं, दुनिया की सांसें थमी हुई हैं।

