छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में करीब दो दशक बाद एक बार फिर न्यायपालिका का सख्त रुख सामने आया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस डिवीजन बेंच ने बड़ा फैसला सुनाते हुए जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। कोर्ट का यह आदेश प्रदेश की राजनीति में हड़कंप मचाने वाला है, क्योंकि अमित जोगी को इस मामले में पहले निचली अदालत से राहत मिल चुकी थी।
यह पूरा मामला 4 जून 2003 का है, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के तत्कालीन कोषाध्यक्ष रामावतार जग्गी की रायपुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जग्गी न केवल एक दिग्गज नेता थे, बल्कि वे पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी और भरोसेमंद सिपहसालार माने जाते थे। उस समय राज्य में अजीत जोगी की सरकार थी और इस हत्याकांड को सीधे तौर पर राजनीतिक रंजिश से जोड़कर देखा गया था, जिसने पूरे देश का ध्यान छत्तीसगढ़ की ओर खींच लिया था।
कानूनी प्रक्रिया की बात करें तो 2007 में रायपुर की एक विशेष अदालत ने इस मामले के 28 आरोपियों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, साक्ष्यों के अभाव का लाभ देते हुए अमित जोगी को तब बरी कर दिया गया था। इस फैसले के खिलाफ जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी ने हार नहीं मानी और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ते हुए मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामला पुनः हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुँचा, जहाँ अब अमित जोगी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।
हाईकोर्ट के इस ताजा निर्देश ने जोगी परिवार की राजनीतिक राह को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। सतीश जग्गी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे सत्य की जीत बताया है, वहीं अमित जोगी के पास अब राहत के लिए केवल सुप्रीम कोर्ट का ही विकल्प शेष है। यदि उन्हें सर्वोच्च अदालत से तत्काल स्टे नहीं मिलता है, तो उन्हें निर्धारित 21 दिनों के भीतर जेल की सलाखों के पीछे जाना होगा। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ की सियासत में ‘जोगी बनाम न्याय’ की बहस को तेज कर दिया है।

