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    Home»देश - विदेश»लोकसभा में गिरा 131वां संविधान संशोधन विधेयक: 2/3 बहुमत जुटाने में नाकाम रही सरकार, महिला आरक्षण बिल खारिज
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    लोकसभा में गिरा 131वां संविधान संशोधन विधेयक: 2/3 बहुमत जुटाने में नाकाम रही सरकार, महिला आरक्षण बिल खारिज

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharyApril 17, 2026437 Views
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    नई दिल्ली: भारतीय संसदीय इतिहास में आज का दिन एक बड़े उलटफेर के रूप में दर्ज हो गया है। केंद्र सरकार द्वारा नारी शक्ति को समर्पित बताया जा रहा 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण गिर गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के पिछले 12 वर्षों के कार्यकाल में इसे सबसे बड़ा विधायी झटका माना जा रहा है। तीन दिनों के विशेष सत्र के दौरान इस बिल पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली, लेकिन अंततः वोटिंग के समय सरकार ‘दो-तिहाई’ के जादुई आंकड़े को छूने में विफल रही।

    सदन में हुई वोटिंग के आंकड़े बताते हैं कि सदन की कुल उपस्थित संख्या 528 थी। इस महत्वपूर्ण विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए इसके विरोध में 230 वोट डाले। चूँकि यह एक संविधान संशोधन विधेयक था, इसलिए इसे पारित होने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई यानी 326 वोटों की दरकार थी। मात्र 28 वोटों की कमी के कारण यह बिल कानून बनने की दहलीज से लौट आया, जिसके तुरंत बाद सरकार ने सदन में मौजूद अन्य दो संबंधित विधेयकों को भी वापस ले लिया।

    इस विधेयक के गिरने का सीधा असर देश की भावी चुनावी संरचना पर पड़ेगा। सरकार के इस 131वें संशोधन प्रस्ताव में लोकसभा सीटों की संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान था। इसके माध्यम से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता साफ होना था। परिसीमन और नई जनगणना के आधार पर सीटों के बंटवारे की योजना भी इसी बिल से जुड़ी थी, जो अब फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बिल गिरने के बाद शेष विधेयकों को वापस लेते हुए गहरी निराशा व्यक्त की।

    मतदान से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसदों से भावुक अपील की थी। उन्होंने कहा था कि यह देश की नारीशक्ति के वंदन का और उन्हें नए अवसरों से जोड़ने का एक ऐतिहासिक अवसर है। पीएम ने सांसदों से अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने और मां-बेटी-पत्नी का स्मरण करते हुए इस संशोधन को सर्वसम्मति से पारित करने का आग्रह किया था। प्रधानमंत्री का मानना था कि यह कदम न केवल महिलाओं को सशक्त बनाएगा बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को और गहरा करेगा, लेकिन विपक्ष उनकी इस अपील से सहमत नजर नहीं आया।

    विपक्ष की ओर से मोर्चा संभालते हुए राहुल गांधी ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने अपने भाषण में 2023 के महिला आरक्षण बिल का हवाला देते हुए कहा कि उस समय भी इसे लागू करने में देरी के संकेत दिए गए थे। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि 850 सीटों का यह नया प्रस्ताव असल में भारत के राजनीतिक नक्शे और चुनावी गणित को बदलने की एक सोची-समझी साजिश है। उनके अनुसार, यह केवल महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा ढांचागत बदलाव छिपा हुआ है जिसे विपक्ष सफल नहीं होने देगा।

    सदन में चर्चा का माहौल बेहद गर्म रहा। करीब 21 घंटे तक चली लंबी बहस में 56 महिला सांसदों सहित कुल 130 सदस्यों ने अपने विचार रखे। जहां सत्ता पक्ष के सदस्य इसे ‘नए भारत’ की नई तस्वीर बता रहे थे, वहीं विपक्ष इसे ‘राजनीतिक छलावा’ करार दे रहा था। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, जिन्होंने इस बिल को पेश किया था, उन्होंने अंत तक तर्क दिया कि यह बिल आधी आबादी को उनका हक दिलाने के लिए अनिवार्य है। हालांकि, भारी हंगामे और लंबी चर्चा के बाद भी सदन में आम सहमति नहीं बन सकी।

    वोटिंग के बाद राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी तेज हो गई है। किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्षी दलों ने महिलाओं को अधिकार देने का एक सुनहरा मौका गंवा दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हार के बावजूद सरकार पीछे नहीं हटेगी और महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी। दूसरी ओर, राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर ‘भारत ने देखा, INDIA ने रोका’ का नारा देते हुए इसे विपक्ष की बड़ी जीत बताया। उन्होंने तर्क दिया कि यह बिल देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुँचाने वाला था।

    इस हार के बाद अब सरकार की आगामी रणनीति पर सबकी नजरें टिकी हैं। सीटों की संख्या 850 करने और परिसीमन प्रक्रिया को नई जनगणना से जोड़ने का जो खाका तैयार किया गया था, वह अब कानूनी पेचीदगियों में फंस सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विफलता का असर आगामी विधानसभा और आम चुनावों के नैरेटिव पर भी पड़ेगा। सरकार इसे विपक्ष के ‘महिला विरोधी’ चेहरे के रूप में पेश करेगी, जबकि विपक्ष इसे ‘संविधान बचाने’ की अपनी जीत के तौर पर भुनाएगा।

    कुल मिलाकर, 2026 का यह विशेष सत्र बिना किसी ठोस विधायी परिणाम के समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है। 131वें संशोधन का गिरना न केवल संख्या बल की कमी को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि आने वाले समय में देश के इलेक्टोरल मैप और संवैधानिक ढांचे में किसी भी बड़े बदलाव के लिए सत्ता पक्ष को विपक्ष को साथ लेकर चलना एक अनिवार्य चुनौती होगी। फिलहाल, महिला आरक्षण और परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में है।

    Brijesh Choudhary
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