तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से ही करिश्माई व्यक्तित्वों और वैचारिक क्रांतियों की प्रयोगशाला रही है। ऐतिहासिक रूप से, राज्य के चुनावी मंच पर किसी नई पार्टी का उदय या तो एक नए युग की शुरुआत (लॉन्चपैड) साबित हुआ है या फिर बड़े-बड़े दिग्गजों की महत्वाकांक्षाओं की कब्रगाह। 2026 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ी अभिनेता विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ (TVK) के लिए पिछला इतिहास एक पथ-प्रदर्शक भी है और एक कड़ी चेतावनी भी।
राज्य में नई पार्टियों की शुरुआत का सबसे सुनहरा अध्याय 1957 में DMK ने लिखा था। सी.एन. अन्नादुराई के नेतृत्व में पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ एक साहित्यिक और सामाजिक आंदोलन के रूप में अपनी पहचान बनाई। अपने पहले ही चुनाव में DMK ने निर्दलीय उम्मीदवारों के माध्यम से 15 सीटें जीतकर और करीब 14.8% वोट हासिल कर यह साबित कर दिया था कि द्रविड़ विचारधारा जनता के मन में घर कर चुकी है। यही वह नींव थी जिसने 1967 में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया।
वहीं, 1977 का चुनाव एक ऐतिहासिक चमत्कार की तरह था। DMK से अलग होने के बाद एम.जी. रामचंद्रन (MGR) ने AIADMK बनाई और अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में सीधे सत्ता की चाबी हासिल की। MGR की पार्टी ने 130 सीटें जीतकर 30% से अधिक वोट हासिल किए, जो आज भी किसी नई पार्टी के लिए एक कीर्तिमान है। इसने स्थापित किया कि फिल्मी सितारों का जन-आधार तमिलनाडु में सीधे राजनीतिक बदलाव लाने में सक्षम है।
हालांकि, हर सितारे की किस्मत MGR जैसी नहीं रही। 1991 में डॉ. एस. रामदास की PMK ने एक मजबूत जातीय आधार (वन्नियार समुदाय) के साथ प्रवेश किया। सम्मानजनक 5.89% वोट हासिल करने के बावजूद पार्टी केवल एक सीट पर सिमट गई। यह इस बात का संकेत था कि केवल सामुदायिक गोलबंदी के दम पर द्रविड़ किलों को ढहाना आसान नहीं है, खासकर जब राज्य में किसी बड़े नेता के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल रही हो।
1996 के चुनावों में दो अलग-अलग परिणाम देखने को मिले। जहाँ जी.के. मूपनार की TMC(M) ने DMK के साथ गठबंधन कर 40 में से 39 सीटें जीतकर स्ट्राइक रेट का नया रिकॉर्ड बनाया, वहीं वाइको की MDMK भारी लोकप्रियता के बावजूद खाता तक नहीं खोल पाई। वाइको का संघर्ष यह दर्शाता है कि चुनावी राजनीति में केवल जनसभाओं की भीड़ और जोशीले भाषण जीत की गारंटी नहीं देते, बल्कि जमीनी गठबंधन और चुनावी समीकरण ज्यादा मायने रखते हैं।
सिनेमाई पर्दे के एक और ‘कैप्टन’ विजयकांत ने 2006 में DMDK के जरिए ‘तीसरे विकल्प’ की उम्मीद जगाई। उन्होंने अकेले चुनाव लड़कर 8.38% वोट हासिल किए, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। हालांकि वह खुद अपनी सीट जीत पाए, लेकिन उनकी पार्टी ने कई सीटों पर DMK और AIADMK के समीकरण बिगाड़ दिए। विजयकांत का यह मॉडल आज के दौर के अभिनेता-राजनेताओं के लिए एक केस स्टडी की तरह है।
हाल के वर्षों में, सीमान की ‘नाम तमिलर काची’ (NTK) और कमल हासन की MNM ने द्रविड़ राजनीति के दोहरे वर्चस्व को चुनौती देने की कोशिश की है। जहाँ सीमान की पार्टी ने 2016 में मात्र 1.06% वोट से शुरुआत की, वहीं कमल हासन की MNM 2021 में करीब 2.6% वोट ही जुटा पाई। ये दोनों पार्टियां यह दर्शाती हैं कि बिना किसी बड़े गठबंधन के द्रविड़ दलों के कैडर आधारित तंत्र को भेदना नई पार्टियों के लिए हिमालय चढ़ने जैसा है।
जयललिता के निधन के बाद उभरी T.T.V. दिनाकरन की AMMK ने भी 2021 में काफी उम्मीदें जगाई थीं, लेकिन वह भी मात्र 2.35% वोट शेयर तक सिमट गई। इन हालिया उदाहरणों से स्पष्ट है कि तमिलनाडु का मतदाता अब केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता और विचारधारा के ठोस विकल्प पर भरोसा करता है।
अब सबकी निगाहें सी. जोसेफ विजय (TVK) पर टिकी हैं। क्या वे MGR की तरह सीधे सत्ता की ओर बढ़ेंगे, या विजयकांत की तरह एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में उभरेंगे? इतिहास गवाह है कि तमिलनाडु में जनता या तो सर-आंखों पर बिठाती है या पूरी तरह नकार देती है। विजय के लिए असली चुनौती द्रविड़ पार्टियों के दशकों पुराने मजबूत बूथ-स्तरीय प्रबंधन और कैडर को मात देने की होगी।

