छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर से साइबर अपराध का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ जालसाजों ने एक सेवानिवृत्त महिला प्रोफेसर को “डिजिटल अरेस्ट” के जाल में फंसाकर उनसे करीब 1 करोड़ 4 लाख 80 हजार रुपए लूट लिए। ठगों ने पीड़िता को टेरर फंडिंग जैसे गंभीर अपराध में संलिप्त होने का डर दिखाकर मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित किया कि उन्होंने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी उनके हवाले कर दी।
घटना की शुरुआत 20 अप्रैल 2026 को हुई, जब सिविल लाइन थाना क्षेत्र के मंगला चौक निवासी रमन श्रीवास्तव को एक अज्ञात नंबर से व्हाट्सएप मैसेज मिला। मैसेज भेजने वाले ने खुद को “संजय पीएसआई” बताया। इसके तुरंत बाद अपराधियों ने वीडियो कॉल कर पीड़िता को धमकाना शुरू कर दिया। ठगों ने दावा किया कि उनके नाम से संदिग्ध लेनदेन हुए हैं और वे एक खतरनाक आतंकवादी समूह से जुड़ी हुई हैं, जिसके लिए उन्हें तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है।
जालसाजों ने मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए पीड़िता को कई घंटों तक वीडियो कॉल पर ही रहने को मजबूर किया, जिसे “डिजिटल अरेस्ट” कहा जाता है। इस दौरान उनसे बैंक खातों, एफडी और परिवार की पूरी जानकारी निकलवाई गई। ठगों ने उन्हें चेतावनी दी कि यदि उन्होंने फोन काटा या किसी परिजन को इस बारे में बताया, तो उन्हें और उनके बेटे-पोतों को भी इस मामले में फंसाकर जेल भेज दिया जाएगा।
अपराधियों का खौफ इस कदर हावी था कि पीड़िता पूरी तरह उनके नियंत्रण में आ गईं। गिरफ्तारी से बचने के लिए ठगों ने उन्हें “वेरिफिकेशन” के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने का आदेश दिया। डरी हुई महिला ने पहले आरटीजीएस (RTGS) के जरिए 20 लाख 20 हजार रुपए भेजे। इसके बाद भी जब ठगों का मन नहीं भरा, तो उन्होंने अलग-अलग किश्तों में कुल 1 करोड़ 4 लाख 80 हजार रुपए विभिन्न बैंक खातों में जमा करवा लिए।
इतनी बड़ी रकम वसूलने के बाद भी साइबर ठगों का लालच खत्म नहीं हुआ और उन्होंने 50 लाख रुपए की अतिरिक्त मांग जारी रखी। जब पीड़िता के पास और पैसे नहीं बचे, तब उन्होंने अपने बेटे प्रशांत श्रीवास्तव से 50 लाख रुपए की मांग की। प्रशांत, जो कि मुंबई में एक एचआर कंसलटेंसी में डायरेक्टर हैं, उन्हें अपनी मां की बातों पर संदेह हुआ और वे तत्काल स्थिति को समझने के लिए बिलासपुर पहुँचे।
बेटे के बिलासपुर पहुँचने पर जब पूरी कहानी सामने आई, तब पीड़िता को एहसास हुआ कि वे किसी पुलिस कार्रवाई का नहीं बल्कि एक सुनियोजित साइबर ठगी का शिकार हुई हैं। प्रशांत ने तुरंत अपनी मां के साथ रेंज साइबर थाना जाकर मामले की लिखित शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि ठगों ने उनकी मां को इतना डरा दिया था कि वे अपने घर के भीतर भी खुद को कैदी जैसा महसूस कर रही थीं।
शिकायत मिलते ही पुलिस प्रशासन हरकत में आया है। रेंज साइबर थाना पुलिस ने अज्ञात मोबाइल नंबर धारकों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 66C, 66D, 308, और 318 के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। पुलिस अब उन बैंक खातों और मोबाइल नंबरों को ट्रैक कर रही है, जिनके जरिए इस बड़ी राशि का लेन-देन किया गया है। साइबर विशेषज्ञों की टीम तकनीकी साक्ष्यों को जुटाने में लगी है।
यह मामला एक बार फिर चेतावनी देता है कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। पुलिस या कोई भी सरकारी जांच एजेंसी व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर न तो किसी की गिरफ्तारी करती है और न ही जमानत के नाम पर पैसों की मांग करती है। यदि कोई आपको इस तरह कॉल पर डराता है, तो घबराने के बजाय तत्काल कॉल काटें और अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन या साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें।

