रायपुर, 30 अप्रैल 2026: अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य एक नए उत्साह के साथ अपनी महिला श्रमशक्ति का अभिनंदन कर रहा है। राज्य की अर्थव्यवस्था में महिला श्रमिकों का बढ़ता कद इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ के विकास की धुरी अब महिलाओं के हाथों में सुरक्षित है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में सरकार ने महिला श्रमिकों की सुरक्षा, स्वावलंबन और सम्मान को अपनी नीतियों के केंद्र में रखा है, जिससे न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक स्तर पर भी सकारात्मक बदलाव दिखने लगे हैं।

वर्तमान में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महिला श्रमिकों की उपस्थिति पहले से कहीं अधिक प्रभावी हुई है। जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं कृषि, वनोपज संग्रहण और हस्तशिल्प जैसे कार्यों में रीढ़ की हड्डी बनी हुई हैं, वहीं शहरी अंचलों में निर्माण कार्य और सेवा क्षेत्र में उनकी भागीदारी तेजी से बढ़ी है। यह बदलाव केवल रोजगार के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की आत्मनिर्भरता और समाज में उनकी उभरती नई पहचान को भी रेखांकित करता है।
इतिहास गवाह है कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को लंबे समय तक वेतन विसंगति और असुरक्षित कार्यस्थल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सरकार ने इन बुनियादी समस्याओं को जड़ से मिटाने के लिए नई श्रमिक नीतियां लागू की हैं। अब न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने के साथ-साथ कार्यस्थलों पर सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन कराया जा रहा है। इसके साथ ही, ‘महिला शक्ति केंद्रों’ के माध्यम से उन्हें कानूनी परामर्श और रोजगार मार्गदर्शन जैसी सुविधाएं एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराई जा रही हैं।
सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने महिला श्रमिकों के जीवन में आर्थिक स्थिरता लाने का काम किया है। ‘मिनीमाता महतारी जतन योजना’ इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसके तहत निर्माण क्षेत्र की पंजीकृत महिला श्रमिकों को प्रसूति के दौरान 20 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है। यह राशि कठिन समय में उनके और उनके नवजात के स्वास्थ्य एवं पोषण को सुनिश्चित करने में मील का पत्थर साबित हो रही है।

वित्तीय स्वतंत्रता की दिशा में ‘महतारी वंदन योजना’ राज्य सरकार का एक क्रांतिकारी कदम है। इसके माध्यम से महिलाओं को प्रति माह 1000 रुपये की निश्चित राशि प्रदान की जा रही है। यह छोटी लगने वाली मदद महिला श्रमिकों के दैनिक खर्चों और छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने में उन्हें किसी पर निर्भर रहने से बचा रही है। इसके साथ ही ‘सिलाई मशीन सहायता योजना’ जैसी पहल उनके स्वरोजगार के सपनों को पंख दे रही है।
परिवहन और आधुनिक रोजगार के क्षेत्र में भी महिलाएं पीछे नहीं हैं। ‘दीदी ई-रिक्शा सहायता योजना’ के अंतर्गत अनुभवी पंजीकृत महिला श्रमिकों को ई-रिक्शा खरीदने के लिए एक लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता दी जा रही है। इससे महिलाएं अब केवल मजदूरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्वयं की मालिक बनकर सड़कों पर विकास की रफ्तार भर रही हैं। यह योजना उन्हें परंपरागत कार्यक्षेत्रों से बाहर निकलकर नए अवसर प्रदान कर रही है।

सामाजिक सुरक्षा के दायरे को और व्यापक बनाते हुए राज्य सरकार ने ‘सक्षम योजना’ के माध्यम से विधवा, परित्यक्ता और तलाकशुदा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। वहीं, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत बने स्वयं सहायता समूह (SHG) महिलाओं में नेतृत्व क्षमता विकसित कर रहे हैं। कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण देकर बाजार की मांग के अनुरूप तैयार किया जा रहा है।
आज छत्तीसगढ़ में महिला श्रमिक केवल एक कार्यबल नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं। शासन की संवेदनशील नीतियों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन ने महिलाओं के भीतर एक नया आत्मविश्वास पैदा किया है। सुरक्षा, सम्मान और स्वरोजगार के त्रिकोण पर टिकी ये योजनाएं न केवल महिलाओं का जीवन स्तर सुधार रही हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ को एक सशक्त और समृद्ध राज्य बनाने की दिशा में सबसे मजबूत आधारशिला के रूप में उभर रही हैं।

