आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के सबसे युवा और प्रभावशाली चेहरों में से एक, राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरियां अब सार्वजनिक हो चुकी हैं। कभी अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार माने जाने वाले राघव चड्ढा पर अब पार्टी ने ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाए हैं। इस घटनाक्रम ने न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं को हैरान कर दिया है, बल्कि दिल्ली से लेकर पंजाब तक की राजनीति में हलचल मचा दी है।
सूत्रों के हवाले से खबर है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अब राघव चड्ढा के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के मूड में है। पार्टी के भीतर उन्हें “एहसान फरामोश” तक कहा जा रहा है। नेतृत्व का तर्क है कि अरविंद केजरीवाल ने एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले कार्यकर्ता को चुनकर संसद के ऊपरी सदन तक पहुंचाया, लेकिन संकट के समय उन्होंने पार्टी की पीठ में छुरा घोंपा है। हाल ही में उन्हें राज्यसभा में ‘डिप्टी लीडर’ के पद से हटा दिया गया था, जो इस कड़वाहट का पहला बड़ा संकेत था।
विवाद की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं जब दिल्ली शराब घोटाले के मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई थी। आरोप है कि उस दौरान राघव चड्ढा ने पार्टी के अन्य नेताओं की तरह केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख नहीं अपनाया। पार्टी के भीतर चर्चा है कि जब पूरी लीडरशिप सड़कों पर थी, तब चड्ढा की सक्रियता काफी सीमित रही। यहाँ तक कि केजरीवाल को अदालत से राहत मिलने के बाद भी उनकी प्रतिक्रिया में वह उत्साह नहीं दिखा, जिसकी उम्मीद एक करीबी सहयोगी से की जाती है।
यह मामला तब और अधिक गंभीर हो गया जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने राघव चड्ढा की जगह डिप्टी लीडर बनाए गए अशोक कुमार मित्तल के ठिकानों पर छापेमारी की। आम आदमी पार्टी ने इस रेड का सीधा संबंध राघव चड्ढा से जोड़ दिया है। पार्टी प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने मीडिया के सामने सनसनीखेज दावा किया कि राघव चड्ढा ने बीजेपी के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की थी और उन्हीं के इशारे पर अशोक मित्तल के खिलाफ यह जांच एजेंसी की कार्रवाई की गई है।
पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि राघव चड्ढा का यह व्यवहार “कृतघ्नता” और “विश्वासघात” की श्रेणी में आता है। प्रियंका कक्कड़ ने स्पष्ट शब्दों में नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि एक कार्यकर्ता को फर्श से अर्श तक पहुँचाने वाली पार्टी के साथ ऐसा असहयोगात्मक रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पार्टी के भीतर अब एक बड़ा धड़ा उन्हें पूरी तरह किनारे करने की मांग कर रहा है, जिससे चड्ढा के राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
दूसरी ओर, इतने गंभीर आरोपों और हमलों के बावजूद राघव चड्ढा ने पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। उन्होंने अभी तक न तो किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर और न ही किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी सफाई पेश की है। हालांकि, पद से हटाए जाने के वक्त उन्होंने दबी आवाज में यह सवाल जरूर पूछा था कि आखिर उनकी गलती क्या है? उन्होंने संकेत दिया था कि क्या संसद में जनता की आवाज उठाना उनके लिए सजा बन गया है, लेकिन फिलहाल उनकी खामोशी कई नए कयासों को जन्म दे रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आम आदमी पार्टी के भीतर यह शक्ति संघर्ष आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। राघव चड्ढा की चुप्पी को उनकी भविष्य की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। क्या वे किसी अन्य राजनीतिक दल का दामन थामेंगे या पार्टी के भीतर ही रहकर अपनी बेगुनाही साबित करेंगे, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, AAP की अंदरूनी राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ से वापसी की राह काफी कठिन नजर आती है।

