भारतीय नौसेना में महिलाओं की भूमिका और उनके अधिकारों को मजबूती देने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने भारतीय नौसेना द्वारा एक महिला अधिकारी को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) न देने के फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद नौसेना में करियर बनाने वाली महिला अधिकारियों के लिए न्याय की राह और अधिक सुगम हो गई है।
यह मामला महिला अधिकारी सीमा चौधरी के स्थायी कमीशन के दावे से जुड़ा हुआ है। भारतीय नौसेना के चयन बोर्ड ने 12 अप्रैल, 2024 को एक आदेश जारी कर महिला अधिकारी को स्थायी कमीशन के लिए अयोग्य ठहरा दिया था। इस फैसले के खिलाफ महिला अधिकारी ने कानूनी लड़ाई लड़ी और मामला देश की शीर्ष अदालत तक पहुँचा, जहाँ से उन्हें यह बड़ी राहत मिली है।
यह महत्वपूर्ण फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमलया बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ द्वारा सुनाया गया है। पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद नौसेना के प्रशासनिक दृष्टिकोण पर कड़ी आपत्ति जताई और चयन बोर्ड के उस निर्णय को गैर-न्यासंगत करार दिया, जिसके तहत अधिकारी का दावा ठुकराया गया था।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारी की गोपनीय रिपोर्टों (ACR) का बारीकी से अध्ययन किया और उन पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिकारी की पिछली रिपोर्टें उनके बेहतरीन और सराहनीय प्रदर्शन को दर्शाती हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ कॉलमों का खाली रहना या पहले की गई ‘सिफारिश न करने’ जैसी मामूली बातें, उनके समग्र अच्छे मूल्यांकन और अनुकूल रिपोर्टों पर भारी नहीं पड़ सकतीं।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि जो भी अधिकारी निर्धारित मानदंडों और उत्कृष्ट ग्रेडिंग को पूरा करती है, उसे केवल तकनीकी या सतही आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता और न्यायोचित व्यवहार को बढ़ावा देने के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट का यह रुख बेहद सख्त और स्पष्ट रहा है।
अपने फैसले को अमली जामा पहनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नौसेना को एक सख्त समयसीमा दी है। अदालत ने नौसेना प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह चयन बोर्ड की बैठक दोबारा बुलाए। इस नए निर्देश के तहत, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के आलोक में छह सप्ताह के भीतर महिला अधिकारी के स्थायी कमीशन के दावे पर नए सिरे से विचार किया जाना अनिवार्य होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय सेनाओं में महिलाओं के सशक्तिकरण और उन्हें समान अवसर दिलाने की लड़ाई में एक मील का पत्थर साबित होगा। इस फैसले से न केवल संबंधित महिला अधिकारी को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है, बल्कि भविष्य में अन्य महिला अधिकारियों के लिए भी सेवा के नियमों में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित होगी।

