बिलासपुर (छत्तीसगढ़) से न्याय की एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मूक-बधिर दुष्कर्म पीड़िता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि शारीरिक अक्षमता कभी भी न्याय पाने के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने आरोपी की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने माना कि पीड़िता द्वारा संकेतों और प्रदर्शन के माध्यम से दी गई गवाही पूरी तरह से वैध और विश्वसनीय है।
इस मामले की सबसे खास बात गवाही की प्रक्रिया रही। पीड़िता की बात को बारीकी से समझने के लिए ट्रायल कोर्ट ने न केवल एक विशेष दुभाषिए (इशारों को समझने वाले विशेषज्ञ) की मदद ली, बल्कि पीड़िता को एक प्लास्टिक की गुड़िया (डेमो) भी उपलब्ध कराई थी। पीड़िता ने उसी गुड़िया के माध्यम से घटनाक्रम का प्रदर्शन किया और आरोपी की पहचान करते हुए पूरी आपबीती बयां की। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि यदि कोई व्यक्ति बोल या सुन नहीं सकता, तो उसके द्वारा संकेतों में दिया गया बयान ‘मौखिक साक्ष्य’ की श्रेणी में ही आता है।
अदालत ने फॉरेंसिक रिपोर्ट और पीड़िता के क्रमबद्ध संकेतों को इतना ठोस माना कि आरोपी के बचने की कोई गुंजाइश नहीं रही। बेंच ने अपनी टिप्पणी में कहा कि “शारीरिक अक्षमता का अर्थ मानसिक अक्षमता नहीं है।” इस फैसले ने यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक कानूनी प्रक्रिया अब इतनी लचीली और संवेदनशील है कि वह हर पीड़ित की भाषा को समझ सकती है। यह निर्णय न केवल आरोपी की सजा को बरकरार रखता है, बल्कि भविष्य के लिए एक ऐसी नजीर पेश करता है जहाँ दिव्यांगजनों के अधिकारों और उनकी गवाही को समान सम्मान दिया जाएगा।

