जशपुर/रायपुर, 19 मार्च 2026: चैत्र के महीने में प्रकृति के नवजीवन का उत्सव ‘सरहुल’ जशपुर के दीपू बगीचा में पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। जनजातीय संस्कृति के इस महाकुंभ में उरांव समुदाय की समृद्ध विरासत और प्रकृति के प्रति अगाध श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिला। आयोजन के दौरान मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने समस्त प्रदेशवासियों को सरहुल महोत्सव और हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए सुख-समृद्धि और उत्तम वर्षा की मंगलकामना की। उन्होंने प्रकृति और मानव के इस अटूट संबंध को सहेजने पर बल दिया।
पवित्र सरना स्थल पर पारंपरिक रस्मों के बीच धरती माता और सूर्य देव के प्रतीकात्मक विवाह की पूजा संपन्न हुई। साल (सरई) वृक्ष की छांव में बैगा और पुजारियों ने विधि-विधान से अनुष्ठान पूर्ण किए। इस अवसर पर पूजा कराने वाले बैगा द्वारा मुख्य अतिथि के कान में सरई का फूल खोंचकर प्रकृति का विशेष आशीष प्रदान किया गया। यह पर्व न केवल ऋतु परिवर्तन का संदेश देता है, बल्कि सामूहिक जीवन मूल्यों और पर्यावरण संरक्षण की सदियों पुरानी गौरवशाली सभ्यता का जीवंत प्रमाण भी है।
महोत्सव के मंच से राज्य में हो रहे सामाजिक और आर्थिक बदलावों की झलक भी साझा की गई। सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उठाए जा रहे कदमों की चर्चा करते हुए ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक’ का उल्लेख किया गया। इसे सामाजिक समरसता और अवैध धर्मांतरण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक अनिवार्य कदम बताया गया, ताकि जनजातीय समाज की मूल पहचान सुरक्षित रह सके। वक्ताओं ने कहा कि राज्य सरकार अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सींचने और संरक्षित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
सरहुल की सबसे मनमोहक प्रस्तुति ‘लोकनृत्य’ के रूप में सामने आई। पारंपरिक वेशभूषा में सजी 100 से अधिक महिलाओं और युवतियों की टोली ने मांदर की थाप पर थिरकते हुए पूरे परिसर को उत्सव के रंग में सराबोर कर दिया। मांदर की गूंजती थाप और लोकगीतों के बीच उमड़े जनसैलाब ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी मिट्टी और संस्कृति के प्रति लोगों का लगाव कम नहीं हुआ है।
कार्यक्रम के दौरान घर-घर जाकर सरई फूल और पवित्र जल का वितरण किया गया, जो खुशहाली और शांति का प्रतीक माना जाता है। इस गौरवशाली उत्सव में अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सत्येंद्र सिंह, राष्ट्रीय महामंत्री श्री योगेश बापट, विधायक श्रीमती गोमती साय सहित कई गणमान्य जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे।
जशपुर का यह सरहुल महोत्सव न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में याद किया जाएगा, बल्कि यह सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति हमारी अटूट कृतज्ञता की एक मिसाल बनकर उभरा है।

