ग्रामीणों का कहना है कि वे गांव में सड़क, बिजली और पुल-पुलिया जैसे विकास कार्यों का स्वागत करते हैं, लेकिन यह विकास उनकी आजीविका की कीमत पर नहीं होना चाहिए। जिन पेड़ों को काटा गया है, उनमें महुआ, टोरा और इमली के फलदार वृक्ष शामिल हैं। आदिवासी समुदायों के लिए ये पेड़ केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि उनकी आय का मुख्य स्रोत हैं। ठेकेदार ने इन पेड़ों को काटने से पहले न तो ग्रामीणों को सूचना दी और न ही वन विभाग से इसकी विधिवत अनुमति लेना जरूरी समझा।
पेड़ों की अवैध कटाई के साथ-साथ ठेकेदार पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी का भी गंभीर आरोप है। बताया जा रहा है कि मुरुम और मिट्टी निकालने के लिए ठेकेदार ने निर्धारित स्थानों के बजाय सड़क के किनारों पर ही जेसीबी से खुदाई कर दी है। इसके कारण सड़क के दोनों ओर बड़े और गहरे गड्ढे बन गए हैं। ग्रामीणों का मानना है कि ये गड्ढे आने वाले समय में बड़ी दुर्घटनाओं का सबब बन सकते हैं। मवेशियों और पैदल चलने वाले ग्रामीणों के लिए ये गड्ढे अब एक जानलेवा खतरा बन चुके हैं।
इस मामले में ग्रामीणों ने ठेकेदार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए काम को तुरंत रोकने और भारी पेनाल्टी लगाने की मांग की है। उनका तर्क है कि ठेकेदार ने अपने निजी लाभ और लागत बचाने के चक्कर में पर्यावरण और जनसुरक्षा को दांव पर लगा दिया है। ग्रामीणों के बढ़ते विरोध और शिकायतों के बाद अब प्रशासन भी हरकत में आ गया है। स्थानीय लोगों ने स्पष्ट किया है कि जब तक ठेकेदार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होती, उनका विरोध जारी रहेगा।
प्रशासनिक स्तर पर, सामान्य वन विभाग के डीएफओ रमेश कुमार जांगड़े ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया है। उन्होंने मीडिया को बताया कि ग्रामीणों की शिकायतों के आधार पर एक विशेष जांच टीम का गठन कर दिया गया है। यह टीम मौके पर जाकर पेड़ों की कटाई और खुदाई से हुए नुकसान का आकलन करेगी। डीएफओ ने आश्वासन दिया है कि जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद यदि ठेकेदार दोषी पाया जाता है, तो उस पर नियमों के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना दर्शाती है कि बस्तर जैसे क्षेत्रों में विकास कार्यों के दौरान स्थानीय पारिस्थितिकी और जन-भावनाओं का सम्मान करना कितना आवश्यक है। बिना योजना और अनुमति के किए गए कार्यों से न केवल पर्यावरण को क्षति पहुँचती है, बल्कि शासन और जनता के बीच का विश्वास भी कमजोर होता है। अब सबकी नजरें वन विभाग की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं कि क्या पीड़ित ग्रामीणों को न्याय मिल पाता है।

