कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस वक्त एक अभूतपूर्व संवैधानिक संकट खड़ा हो गया जब राज्यपाल ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174 (2)(ख) के तहत मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए मौजूदा विधानसभा को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया। यह आदेश ऐसे समय में आया है जब राज्य में विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होनी है। राजभवन द्वारा जारी इस आदेश के बाद अब निवर्तमान मंत्रिपरिषद और विधानसभा का कार्यकाल आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गया है।
राज्यपाल का यह कड़ा फैसला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस अड़ियल रुख के बाद आया है, जिसमें उन्होंने विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बावजूद अपने पद से इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया था। सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत, हार के बाद मुख्यमंत्री को राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपना होता है ताकि नई सरकार के शपथ ग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो सके। हालांकि, ममता बनर्जी ने इस परंपरा को चुनौती देते हुए पद छोड़ने से मना कर दिया, जिसके कारण राज्यपाल को संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करना पड़ा।
तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने चुनाव परिणामों को पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे ‘जनादेश नहीं बल्कि एक गहरी साजिश’ करार दिया है। मंगलवार, 6 मई 2026 को मीडिया से बात करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग 100 सीटों पर जनता के मतों को लूटा गया है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि वह लोक भवन (राजभवन) जाकर इस्तीफा नहीं देंगी, क्योंकि उनके अनुसार उनकी हार लोकतांत्रिक तरीके से नहीं बल्कि हेरफेर के जरिए हुई है।
ममता बनर्जी ने इस हार के लिए सीधे तौर पर चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस का मुकाबला किसी राजनीतिक दल से नहीं बल्कि चुनाव आयोग जैसी संस्था से था, जो कथित तौर पर विपक्षी खेमे के लिए काम कर रही थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि मतगणना की गति को जानबूझकर धीमा किया गया ताकि उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं का मनोबल तोड़ा जा सके। उनके अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया तृणमूल को सत्ता से बाहर करने का एक पूर्व-नियोजित षड्यंत्र था।
संवैधानिक जानकारों का मानना है कि चूंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल मई 2021 से मई 2026 तक था, इसलिए कार्यकाल समाप्त होने पर राज्यपाल द्वारा विधानसभा भंग करना एक अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया है। इस आदेश के बाद तकनीकी रूप से ममता बनर्जी को इस्तीफा देने की आवश्यकता नहीं रह गई है, क्योंकि जिस सदन की वह नेता थीं, अब वह अस्तित्व में ही नहीं रहा। हालांकि, मुख्यमंत्री का इस्तीफा न देना भारतीय संसदीय इतिहास में एक दुर्लभ घटना के रूप में दर्ज किया गया है।
अपनी हार और इस्तीफे के विवाद के बीच, ममता बनर्जी ने अब सीधे जनता के बीच जाने का फैसला किया है। उन्होंने घोषणा की है कि वह सड़कों पर उतरकर इस ‘साजिश’ के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगी। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन को और अधिक मजबूत करने का संकल्प लिया है, ताकि भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया जा सके। राज्य में इस वक्त राजनीतिक तनाव चरम पर है और सभी की नजरें नई सरकार के गठन पर टिकी हैं।

