रायपुर, 04 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ में आगामी खरीफ सीजन के दौरान रासायनिक उर्वरकों की संभावित किल्लत और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए राज्य सरकार ने जैविक विकल्पों को अपनाने की मुहिम तेज कर दी है। इसी कड़ी में कृषि उत्पादन आयुक्त श्रीमती शहला निगार ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में कृषि अधिकारियों और वैज्ञानिकों के लिए ‘हरिट खाद, नीली-हरी शैवाल एवं जैव उर्वरक’ पर आधारित एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कृषि अधिकारियों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाना है ताकि वे गांव-गांव जाकर किसानों को वैकल्पिक उर्वरकों के प्रति जागरूक कर सकें।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्रीमती शहला निगार ने बताया कि रासायनिक उर्वरक अब केवल एक विकल्प नहीं रह गए हैं, बल्कि उनकी आपूर्ति पर वैश्विक संकट के बादल मंडरा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हरित खाद और नीली-हरी शैवाल जैसे जैविक विकल्प फसलों की कुल पोषक आवश्यकता का लगभग 50 प्रतिशत तक हिस्सा अकेले पूरा करने में सक्षम हैं। उन्होंने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि अगले दो से तीन महीनों के भीतर इन उन्नत तकनीकों को प्रयोगशालाओं से निकालकर प्रदेश के हर खेत तक पहुंचाया जाए, ताकि खरीफ की बुआई के समय किसानों को परेशानी न हो।

विशेषज्ञों ने तकनीकी सत्रों में वर्तमान वैश्विक स्थिति का हवाला देते हुए बताया कि ईरान और दक्षिण-पूर्व एशिया में जारी संघर्षों के कारण पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरक निर्माण में लगने वाले कच्चे माल के आयात में बाधा आ सकती है। ऐसी स्थिति में, छत्तीसगढ़ द्वारा टिकाऊ कृषि की दिशा में उठाए गए ये कदम राज्य की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य हैं। विशेषज्ञों ने जोर दिया कि मृदा स्वास्थ्य में गिरावट को रोकने के लिए अब रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करना ही एकमात्र विकल्प बचा है।
प्रशिक्षण के दौरान इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने नीली-हरी शैवाल (BGA) के उत्पादन का व्यावहारिक प्रदर्शन भी किया। बताया गया कि धान की खेती में नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए यह तकनीक अत्यंत प्रभावी और सस्ती है। इसके साथ ही हरित खाद के उपयोग से मिट्टी की भौतिक और रासायनिक संरचना में होने वाले सुधारों पर भी विस्तृत चर्चा की गई। वैज्ञानिकों का मानना है कि समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management) को अपनाकर न केवल खेती की लागत घटाई जा सकती है, बल्कि उत्पादन की गुणवत्ता में भी सुधार किया जा सकता है।
अंत में, विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरिश चंदेल और राज्य के विभिन्न जिलों से आए 150 से अधिक कृषि अधिकारियों ने संकल्प लिया कि वे इस तकनीक को जन-आंदोलन बनाएंगे। इस पहल से न केवल उर्वरकों के लिए विदेशी निर्भरता कम होगी, बल्कि प्रदेश का किसान आत्मनिर्भर बनेगा और पर्यावरण को भी रासायनिक प्रदूषण से बचाया जा सकेगा। आगामी खरीफ सीजन के लिए प्रदेश में इन जैविक विकल्पों के व्यापक उत्पादन और वितरण की विस्तृत कार्ययोजना भी तैयार कर ली गई है।

