देशभर में खराब सड़कों और गड्ढों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए एक बेहद क्रांतिकारी पहल शुरू की गई है। सड़क परिवहन और बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के उद्देश्य से अब ‘रोड एम्बुलेंस’ की अवधारणा को तेजी से लागू किया जा रहा है। इस अनूठी व्यवस्था के तहत जैसे ही सड़क पर कोई गड्ढा, दरार या अन्य तकनीकी खामी नजर आएगी, उसे बिना किसी लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया के तुरंत चिन्हित कर लिया जाएगा और महज 48 घंटे के भीतर उसकी मरम्मत का कार्य पूरा कर दिया जाएगा।
यह ‘रोड एम्बुलेंस’ कोई सामान्य वाहन नहीं, बल्कि अपने आप में एक चलती-फिरती अत्याधुनिक मिनी वर्कशॉप है। इस विशेष वाहन में सड़क सुधार के लिए जरूरी सभी आधुनिक उपकरण जैसे कोल्ड मिक्स, बिटुमिन इमल्शन, एग्रीगेट, प्लेट कॉम्पैक्टर, एयर कंप्रेसर और जनरेटर जैसी सामग्रियां हमेशा उपलब्ध रहती हैं। इसके अलावा, वाहन में 3 से 5 कुशल तकनीशियन और श्रमिकों की एक टीम तैनात रहती है, जो मौके पर पहुंचकर तुरंत प्राथमिक मरम्मत का काम शुरू कर देती है, जिससे समस्या गंभीर रूप नहीं ले पाती।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि छोटी-मोटी कमियों को सुधारने के लिए अब बड़े टेंडर और महीनों लंबी कागजी प्रक्रियाओं का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। अक्सर शुरुआती दौर में अनदेखी किए जाने वाले छोटे गड्ढे बरसात और भारी ट्रैफिक के कारण बड़े हादसों का कारण बन जाते हैं। ‘रोड एम्बुलेंस’ के जरिए इन शुरुआती नुकसानों को समय पर थाम लिया जाएगा, जिससे सड़कों की उम्र लंबी होगी और सरकार के खजाने पर बार-बार बड़े पैमाने पर रिकारपेटिंग का अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ेगा।
विशेष रूप से मानसून और आपातकालीन स्थितियों में यह प्रणाली काफी मददगार साबित हो रही है। बारिश के मौसम में जलभराव या सड़क धंसने की घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए यह यूनिट मौके पर पहुंचती है और यातायात को बाधित होने से बचाती है। इसके साथ ही, आंधी-तूफान के कारण सड़क पर गिरे पेड़ों को हटाने या मलबे को साफ करने जैसे कार्यों में भी यह वाहन प्रशासनिक अमले के पहुंचने से पहले ही राहत और बचाव कार्य सुनिश्चित कर देता है।
इस पूरी प्रक्रिया में पूरी तरह से पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रत्येक ‘रोड एम्बुलेंस’ वाहन जीपीएस (GPS) और उच्च गुणवत्ता वाले डैशकैम से लैस है, जिससे केंद्रीय नियंत्रण कक्ष से उनकी लोकेशन और रिस्पॉन्स टाइम की लाइव निगरानी की जाती है। साथ ही, गड्ढे की शिकायत मिलने से लेकर मरम्मत के बाद की जियो-टैग्ड (Geo-tagged) तस्वीरें पोर्टल पर अपलोड की जाती हैं, जिससे यह साफ हो जाता है कि तय समयसीमा के भीतर गुणवत्तापूर्ण काम पूरा हुआ है या नहीं।

