सरकार की ओर से यह आश्वासन दिया गया है कि भारत के संविधान द्वारा दी गई अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता सर्वोपरि है। कोई भी साधारण कानून संविधान के इन मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता है। अश्विनी वैष्णव ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता लोकतंत्र का एक मुख्य स्तंभ है, और सरकार इसे मजबूत बनाए रखने के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसलिए, DPDP अधिनियम के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो खोजी पत्रकारों को उनके पारंपरिक तरीकों से काम करने से रोके।
मीडिया घरानों और संपादकों की शंकाओं को दूर करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम उठाते हुए, केंद्रीय मंत्री ने सभी प्रमुख संपादकों, मीडिया संगठनों और पत्रकारों को खुली चर्चा के लिए आमंत्रित किया है। उन्होंने कहा कि यदि कानून के किसी विशेष खंड या नियम को लेकर मीडिया जगत में कोई असमंजस या वैचारिक मतभेद है, तो सरकार संवाद के जरिए उसका समाधान निकालने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह खुला आमंत्रण इस बात का प्रतीक है कि सरकार लोकतंत्र में सभी हितधारकों के सुझावों को महत्व देती है।
इस विवाद की पृष्ठभूमि में डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई वह याचिका है, जिसमें DPDP अधिनियम के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि डेटा प्रोसेसिंग और पूर्व सहमति (Prior Consent) से जुड़े कड़े नियम पत्रकारों के लिए स्रोतों तक पहुंच और भ्रष्टाचार या अनियमितताओं से जुड़ी खोजी रिपोर्ट तैयार करना असंभव बना सकते हैं। इसी कानूनी और वैचारिक खींचतान के मद्देनजर सरकार ने अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की है।
सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया है कि डीपीटीपी अधिनियम के दायरे में पत्रकारों और मीडिया घरानों के लिए उचित छूट या स्पष्टीकरण का प्रावधान है। इसके तहत किसी व्यक्ति के बारे में जनहित में समाचार प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए हर बार अलग से सहमति लेने की अनिवार्यता नहीं होगी। साथ ही, यह कानून किसी भी पत्रकार को उसके गोपनीय स्रोतों का खुलासा करने के लिए मजबूर नहीं करता, जो कि खोजी पत्रकारिता की रीढ़ माने जाते हैं।
तकनीकी युग में नागरिकों की गोपनीयता और प्रेस की आजादी के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है, जिसे सरकार समझती है। अश्विनी वैष्णव ने कहा कि एक तरफ जहां आम जनता के डेटा का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ लोकतंत्र के पहरेदारों यानी मीडिया का कामकाज भी सुचारू रूप से चलना चाहिए। दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए ही कानून के क्रियान्वयन के दौरान व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है।
भविष्य की रूपरेखा पर चर्चा करते हुए मीडिया विशेषज्ञों और कानूनविदों का मानना है कि सरकार और संपादकों के बीच होने वाली यह बैठकें काफी निर्णायक साबित होंगी। संवाद के माध्यम से यदि दोनों पक्ष किसी सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो इससे अदालती मुकदमेबाजी कम होगी और कानून का पालन भी सहजता से हो सकेगा। कुल मिलाकर, यह स्पष्ट हो चुका है कि DPDP अधिनियम मीडिया की आवाज को दबाने का जरिया नहीं, बल्कि एक सुरक्षित डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करने का माध्यम है।

