आईआईटी खड़गपुर और यूके की क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी के हालिया मल्टी-गैस मॉडलिंग अध्ययन ने वैश्विक जलवायु राजनीति में एक नया और महत्वपूर्ण दृष्टिकोण सामने रखा है। इस शोध के अनुसार, प्री-इंडस्ट्रियल काल से लेकर वर्ष 2024 तक वैश्विक तापमान वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) में भारत का ऐतिहासिक योगदान मात्र 0.05 डिग्री सेल्सियस (लगभग 0.047 से 0.05°C) दर्ज किया गया है।
अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश का यह योगदान प्रमुख पश्चिमी और औद्योगिकीकृत देशों की तुलना में बेहद कम है। अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से वैश्विक तापमान को सबसे ज्यादा 0.27 डिग्री सेल्सियस तक प्रभावित किया है, जो इस सूची में शीर्ष पर है। इसके बाद चीन का योगदान लगभग 0.19 डिग्री सेल्सियस और यूरोपीय संघ (EU) का योगदान लगभग 0.17 डिग्री सेल्सियस आंका गया है। रूस का वार्मिंग में योगदान लगभग 0.07 से 0.08 डिग्री सेल्सियस के बीच है।
शोध के विश्लेषण के अनुसार, भारत के इस 0.05 डिग्री सेल्सियस के कुल वार्मिंग योगदान में सबसे बड़ा हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र का है। भारत के कुल वार्मिंग प्रभाव का लगभग 61% हिस्सा जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के उपयोग और ऊर्जा उत्पादन से आता है, जिसमें 1990 के दशक के बाद देश के तीव्र आर्थिक विकास के साथ तेजी देखने को मिली है।
इसके अलावा, भारत के जलवायु प्रभाव में कृषि और गैर-कार्बन डाइऑक्साइड (Non-CO2) गैसों की भी एक बड़ी भूमिका रही है। अध्ययन में पाया गया कि भारत के वार्मिंग योगदान का लगभग 28% से 40% हिस्सा मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसों से जुड़ा है, जिनका मुख्य स्रोत कृषि गतिविधियाँ और पशुधन प्रबंधन हैं।
भले ही ऐतिहासिक उत्सर्जन के मामले में भारत विकसित देशों से बहुत पीछे है, लेकिन वैज्ञानिक और नीतिगत स्तर पर इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि देश की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय स्थितियां इसे जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती हैं। भारत की उष्णकटिबंधीय (Tropical) स्थिति और घनी आबादी के कारण यहाँ अत्यधिक गर्मी, अनियमित मानसून और बाढ़-सूखा जैसी चरम मौसमी घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं।
इन गंभीर जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार और विभिन्न एजेंसियाँ अब वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ घरेलू स्तर पर भी ठोस कदम उठा रही हैं। देश ने नेट-जीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने और अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के वास्ते सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य हरित तकनीकों (Green Technologies) में भारी निवेश करना शुरू कर दिया है।
कुल मिलाकर, यह अध्ययन एक बार फिर ‘ऐतिहासिक उत्तरदायित्व’ के सिद्धांत को रेखांकित करता है। यह स्पष्ट करता है कि जलवायु संकट के लिए मुख्य रूप से पश्चिमी देश और अन्य बड़े उत्सर्जक जिम्मेदार रहे हैं, फिर भी भारत एक जिम्मेदार वैश्विक नागरिक के रूप में सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में तेजी से अग्रसर है।

