बिलासपुर: हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को अपने निजी आवास के भीतर शांतिपूर्ण तरीके से प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए प्रशासन या पुलिस से पूर्व अनुमति लेने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने यह निर्णय सुनाते हुए नवागढ़ पुलिस द्वारा याचिकाकर्ताओं को जारी किए गए सभी नोटिसों को निरस्त कर दिया है। अदालत ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे जांच के नाम पर नागरिकों को अनावश्यक रूप से परेशान न करें।
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ थाना अंतर्गत ग्राम गोधन का है, जहाँ दो रिश्तेदारों ने अपने निजी मकान की पहली मंजिल पर बने हॉल में वर्ष 2016 से ईसाई धर्म की प्रार्थना सभा आयोजित करने की बात कही थी। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि वे अपने मकान के वैध स्वामी हैं और वहां किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि या शांति भंग नहीं की जाती। इसके बावजूद, पुलिस द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 94 के तहत बार-बार नोटिस जारी कर इन सभाओं पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही थी।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पूर्व में आपराधिक मामले दर्ज हैं और वे जेल भी जा चुके हैं। सरकारी वकील का तर्क था कि बिना किसी सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के सामूहिक प्रार्थना सभाएं आयोजित की जा रही थीं, जिसके कारण कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से नोटिस जारी किए गए थे। राज्य ने इस मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय की मांग भी की थी, जिसे कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए आवश्यक नहीं समझा।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी कि निजी संपत्ति पर धार्मिक आयोजन करना व्यक्ति का अधिकार है और इस पर कोई सामान्य कानूनी प्रतिबंध नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि इन सभाओं से शोर-शराबा होता है या सार्वजनिक शांति भंग होती है, तभी संबंधित अधिकारी विधि सम्मत कार्रवाई कर सकते हैं। केवल ‘प्रार्थना सभा’ आयोजित करने को आधार बनाकर किसी के नागरिक अधिकारों में हस्तक्षेप करना अनुचित है।
अंततः, माननीय न्यायालय ने 18 अक्टूबर 2025 से लेकर 1 फरवरी 2026 के बीच जारी किए गए पुलिस के सभी नोटिसों को रद्द कर दिया। यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकार को मजबूती प्रदान करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि शांतिपूर्ण उपासना के लिए किसी भी नागरिक को प्रशासनिक दबाव का सामना न करना पड़े।

