पटना: बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधान परिषद (MLC) की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है, जिससे उनके दिल्ली कूच और राज्यसभा जाने का रास्ता साफ हो गया है। इस इस्तीफे के साथ ही राज्य में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। एनडीए खेमे में हलचल तेज है और माना जा रहा है कि 15 अप्रैल तक बिहार को नया मुख्यमंत्री मिल जाएगा।
नीतीश कुमार आगामी 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे। शपथ लेने के अगले ही दिन, यानी 11 अप्रैल को उनके मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की संभावना है। हालांकि, शासन व्यवस्था में निरंतरता बनाए रखने के लिए वे नई सरकार के अस्तित्व में आने तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभालते रहेंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 14 अप्रैल को खरमास समाप्त होते ही बिहार की नई कैबिनेट शपथ लेगी।
एनडीए के भीतर नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। गठबंधन के सहयोगी दलों, जैसे जीतन राम मांझी की ‘हम’ और चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास), ने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को अपना समर्थन देने के संकेत दिए हैं। जीतन राम मांझी ने सार्वजनिक रूप से सम्राट चौधरी के नाम का प्रस्ताव रखा है, जिसे गठबंधन के भीतर एक मजबूत दावेदारी के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री पद की रेस में वर्तमान उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सबसे आगे चल रहे हैं। ओबीसी (कुशवाहा) समुदाय से आने वाले सम्राट चौधरी की पकड़ युवाओं और पिछड़ों के बीच काफी मजबूत मानी जाती है। भाजपा उन्हें आगे कर 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव और बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए एक बड़ा दांव खेल सकती है। खुद नीतीश कुमार ने भी अपनी हालिया यात्राओं के दौरान कई बार सम्राट चौधरी की ओर सकारात्मक इशारे किए हैं।
सम्राट चौधरी के अलावा केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय का नाम भी चर्चाओं में बना हुआ है। नित्यानंद राय को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बेहद करीबी माना जाता है और यादव समुदाय के बीच उनकी पैठ भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व किसी ऐसे चेहरे पर दांव लगाना चाहता है जो न केवल शासन चलाने में सक्षम हो, बल्कि विपक्षी गठबंधन (RJD) के वोट बैंक में भी सेंध लगा सके।
जदयू (JDU) के भविष्य को लेकर भी इस बार नई रणनीति देखने को मिल रही है। चर्चा है कि नई सरकार में जदयू कोटे से दो उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। इनमें नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार का नाम सबसे ऊपर है। निशांत कुमार के राजनीति में हालिया प्रवेश और उनके युवा चेहरे को पार्टी की अगली पीढ़ी के नेतृत्व के रूप में देखा जा रहा है। उनके साथ अनुभवी नेता विजय चौधरी को प्रशासनिक संतुलन के लिए उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा और वरिष्ठ नेता ललन सिंह को भाजपा नेतृत्व के साथ बातचीत का जिम्मा सौंपा गया है। पटना से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर जारी है। संजय झा ने स्पष्ट किया है कि मुख्यमंत्री किस दल का होगा, इसका अंतिम निर्णय एनडीए की संयुक्त बैठक में लिया जाएगा। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह लगभग तय माना जा रहा है कि बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री शपथ लेगा।
बिहार की यह नई सियासी बिसात न केवल राज्य की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करेगी, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए एनडीए के आधार को भी मजबूत करेगी। नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना उनके लंबे राजनीतिक करियर का एक नया पड़ाव है, जहाँ वे राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए को मजबूती प्रदान करेंगे। अब सबकी नजरें 15 अप्रैल पर टिकी हैं, जब बिहार की नई सरकार का औपचारिक खाका जनता के सामने होगा।

