नई दिल्ली: मध्य पूर्व (Middle East) में जारी ईरान-इजराइल संघर्ष का असर अब भारतीयों की जेब और उनकी सेहत पर पड़ने वाला है। खाड़ी देशों में गिरती मिसाइलों और ‘हॉर्मुज रूट’ के बाधित होने के कारण भारत में कंडोम की कीमतों में 50% तक की भारी बढ़ोतरी होने की आशंका जताई जा रही है। युद्ध के कारण वैश्विक लॉजिस्टिक्स और कच्चे माल की सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है, जिससे मैनकाइंड फार्मा, HLL लाइफकेयर और क्यूपिड लिमिटेड जैसी दिग्गज कंपनियां कच्चे माल की भारी किल्लत का सामना कर रही हैं।
कंडोम निर्माण में इस्तेमाल होने वाली छह प्रमुख सामग्रियों में से अधिकांश का भारत आयात करता है। सबसे बड़ा संकट अमोनिया को लेकर है, जिसका उपयोग लेटेक्स को जमने से बचाने के लिए किया जाता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 86% अमोनिया सऊदी अरब, कतर और ओमान जैसे देशों से मंगाता है। युद्ध की वजह से समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं, जिससे जहाजों की आवाजाही ठप है। इसके अलावा, चीन से आने वाले सिलिकॉन ऑयल और रसायनों जैसे सल्फर और जिंक ऑक्साइड के दाम भी आसमान छू रहे हैं, जिससे उत्पादन लागत कई गुना बढ़ गई है।
इंडस्ट्री के सूत्रों के अनुसार, कच्चे माल की कमी का फायदा उठाकर सप्लायर्स ने जमाखोरी शुरू कर दी है। इसी वजह से आने वाले दिनों में न केवल कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि बाजार से मैनफोर्स, ड्यूरेक्स और कामसूत्र जैसे आपके पसंदीदा ब्रांड्स के पैकेट गायब भी हो सकते हैं। हालांकि बड़ी कंपनियों ने अभी तक कीमतों में आधिकारिक वृद्धि पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन लागत में इस कदर उछाल आने के बाद कंपनियों के पास दाम बढ़ाना ही एकमात्र रास्ता बचेगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि कंडोम की कीमतों में थोड़ी सी भी वृद्धि का सीधा असर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर पड़ता है। अगर कीमतें 50% बढ़ती हैं, तो लोग इनका इस्तेमाल कम कर सकते हैं, जिससे अनचाहे गर्भ के मामले तेजी से बढ़ सकते हैं। इसके अलावा, सुरक्षित यौन संबंधों में कमी आने से यौन संचारित रोगों (STIs) और HIV के प्रसार का खतरा भी कई गुना बढ़ जाएगा, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
यह संकट भारत सरकार के ‘नेशनल फैमिली प्लानिंग प्रोग्राम’ के लिए भी एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। सरकार का लक्ष्य साल 2030 तक गर्भनिरोधकों की मांग को 75% तक पूरा करना है, लेकिन कच्चे माल की किल्लत और बढ़ती कीमतें इस मिशन की राह में रोड़ा अटका रही हैं। यदि युद्ध लंबा खिंचता है और सप्लाई चेन बहाल नहीं होती है, तो यह संकट केवल स्वास्थ्य तक सीमित न रहकर एक गंभीर सामाजिक समस्या का रूप ले सकता है। फिलहाल, सबकी नजरें अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और व्यापारिक मार्गों के फिर से खुलने पर टिकी हैं।

