केंद्र सरकार ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे खतरनाक साइबर फ्रॉड पर लगाम लगाने के लिए अब तक की सबसे सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। गृह मंत्रालय के निर्देश पर WhatsApp को उन संदिग्ध डिवाइस IDs को ब्लॉक करने का आदेश दिया गया है, जिनका इस्तेमाल ठग मासूम लोगों को डराने और पैसे वसूलने के लिए कर रहे हैं। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अपराधी एक ही फोन (डिवाइस) से बार-बार नए अकाउंट बनाकर ठगी को अंजाम देते थे, लेकिन अब डिवाइस लेवल पर बैन लगने से उनका पूरा सिस्टम ठप हो जाएगा।
जांच में सामने आया है कि ये अपराधी खुद को पुलिस, CBI या ED का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल करते हैं और “डिजिटल गिरफ्तारी” का डर दिखाकर लाखों रुपये ऐंठ लेते हैं। सरकार अब WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म्स पर अतिरिक्त सुरक्षा फीचर्स लागू करने और डिलीट किए गए अकाउंट्स का डेटा 180 दिनों तक सुरक्षित रखने पर विचार कर रही है। इसके अलावा, फर्जी APK फाइल और ऐप्स की पहचान कर उन्हें ब्लॉक करने की तैयारी भी की जा रही है, ताकि तकनीकी रूप से सेंधमारी के रास्ते बंद किए जा सकें।
तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, डिवाइस ID किसी भी फोन की एक यूनिक पहचान होती है, जिसमें IMEI नंबर, MAC एड्रेस और सीरियल नंबर जैसे डेटा शामिल होते हैं। इनकी मदद से किसी भी अपराधी को ट्रैक करना आसान हो जाता है। डिजिटल अरेस्ट स्कैम में ठग अक्सर फर्जी पार्सल या किसी केस का नाम लेकर पीड़ित को घंटों वीडियो कॉल पर “जांच” के नाम पर बंधक बनाकर रखते हैं। सरकार का यह नया प्रहार सीधे उन उपकरणों को निशाना बनाएगा जो इन संगठित अपराधों के केंद्र हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय कानून में ‘ऑनलाइन गिरफ्तारी’ या ‘डिजिटल अरेस्ट’ का कोई प्रावधान नहीं है। कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर जांच नहीं करती और न ही पैसे मांगती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि अनजान नंबरों से आने वाली कॉल पर भरोसा न करें और अपनी बैंक डिटेल्स या OTP कभी साझा न करें। यदि आपको ऐसी कोई संदिग्ध कॉल आती है, तो बिना घबराए तुरंत उसे काटें और साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर सूचित करें।
यहाँ इस पूरे मामले और कार्रवाई से जुड़ी मुख्य बातें दी गई हैं:
सरकार का बड़ा एक्शन: मुख्य बिंदु
WhatsApp को निर्देश: भारत सरकार के गृह मंत्रालय (MHA) के अधीन ‘इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर’ (I4C) ने WhatsApp को निर्देश दिया है कि वह उन संदिग्ध डिवाइस IDs को तुरंत ब्लॉक करे, जिनका उपयोग इन स्कैम्स के लिए किया जा रहा है।
डिवाइस की पहचान: रिपोर्टों के अनुसार, जांच एजेंसियों ने हजारों ऐसे फोन और डिवाइस की पहचान की है जिनसे डिजिटल अरेस्ट की फर्जी कॉल की जा रही थीं।
अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर प्रहार: यह पाया गया है कि इन घोटालों के तार अक्सर सीमा पार (कंबोडिया, म्यांमार और वियतनाम जैसे देशों) से जुड़े होते हैं। डिवाइस ID ब्लॉक होने से स्कैमर्स के लिए नया सेटअप करना मुश्किल हो जाएगा।
क्या होता है ‘डिजिटल अरेस्ट’?
अगर आप या आपके आसपास कोई इस बारे में नहीं जानता, तो यह समझना जरूरी है कि यह स्कैम काम कैसे करता है:
कॉल की शुरुआत: स्कैमर आपको कॉल करके डराते हैं कि आपके नाम से कोई ड्रग्स का पार्सल पकड़ा गया है या आपके फोन नंबर का इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधियों में हुआ है।
दबाव बनाना: वे खुद को CBI, ED या पुलिस अधिकारी बताते हैं और स्काइप या व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर रहने को कहते हैं।
डिजिटल कैद: वे पीड़ित को कैमरे के सामने बैठे रहने का आदेश देते हैं और कहते हैं कि आप “डिजिटल अरेस्ट” में हैं। इस दौरान वे पीड़ित को किसी से बात करने या घर से निकलने नहीं देते।
पैसे की वसूली: अंत में, ‘मामला रफा-दफा’ करने के नाम पर लाखों रुपये अपने अकाउंट में ट्रांसफर करवा लेते हैं।
सुरक्षा के लिए क्या करें?
महत्वपूर्ण तथ्य: भारतीय कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई प्रावधान नहीं है। कोई भी पुलिस या सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल के जरिए किसी को गिरफ्तार नहीं करती और न ही पैसे मांगती है।
1930 डायल करें: यदि आपके साथ ऐसा कुछ होता है, तो तुरंत साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें।
रिपोर्ट करें: cybercrime.gov.in पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज करें।
अनजान कॉल से बचें: अंतरराष्ट्रीय नंबरों (+92, +84, आदि) से आने वाली व्हाट्सएप कॉल को लेकर बेहद सतर्क रहें।
इस तरह की कार्रवाई से निश्चित तौर पर स्कैमर्स के नेटवर्क में सेंध लगेगी, लेकिन व्यक्तिगत सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।

