सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही के ऑडियो-वीडियो फुटेज की सुरक्षा और दुरुपयोग को रोकने के लिए एक कड़ा कदम उठाते हुए इसके सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारण पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट के इस आदेश के तहत अब बिना पूर्व अनुमति के अदालत की कार्यवाही के वीडियो या ऑडियो को किसी भी डिजिटल माध्यम पर अपलोड, पोस्ट, री-पोस्ट, मॉनेटाइज या संग्रहित नहीं किया जा सकेगा।
यह अंतरिम आदेश 24 जुलाई 2026 को हर्षिता ग्रोवर द्वारा दायर की गई एक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा और शुचिता बनाए रखने के लिए यह नियम बेहद आवश्यक है ताकि अदालती बयानों और कार्यवाहियों को भ्रामक तरीके से पेश करने या उनके व्यावसायिक इस्तेमाल (मॉनेटाइजेशन) पर लगाम लगाई जा सके।
न्यायालय ने अपनी व्यवस्था में यह भी साफ किया है कि इस अंतरिम आदेश का असर मान्यता प्राप्त समाचार संस्थानों और पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। अधिकृत मीडिया हाउस और पत्रकार पहले की तरह अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों के तहत अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग जारी रख सकेंगे, बशर्ते वे अनधिकृत वीडियो या ऑडियो क्लिप्स के सीधे प्रसारण का उपयोग न करें।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों (High Courts) को भी इस मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। आंध्र प्रदेश, इलाहाबाद, बॉम्बे, कलकत्ता, गुजरात, हिमाचल प्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को भी प्रतिवादी क्रमांक 12 के रूप में इस कानूनी दायरे में शामिल किया गया है।
शीर्ष अदालत ने सभी संबंधित हाईकोर्ट्स को यह निर्देश दिया है कि वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए लाइव स्ट्रीमिंग से संबंधित मॉडल नियमों को अपने यहाँ अपनाने की स्थिति पर एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करें। इस रिपोर्ट में लगातार और निर्बाध लाइव स्ट्रीमिंग के जमीनी प्रभाव और इसकी तकनीकी व्यवहारिकता का ब्योरा भी मांगा गया है।
इस पूरी व्यवस्था के तहत यह अनिवार्य कर दिया गया है कि भविष्य में किसी भी न्यायिक कार्यवाही की रिकॉर्डिंग का उपयोग, प्रसार या ट्रांसमिशन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल या संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा। अदालत का यह कदम न्यायिक प्रक्रियाओं की गोपनीयता, निष्पक्षता और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।

