छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में ‘बाहरी’ कुलपतियों पर बवाल, अजय चंद्राकर ने विधानसभा में उठाए सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के दौरान शासकीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति का मुद्दा गरमा गया है। भाजपा के वरिष्ठ विधायक और पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री अजय चंद्राकर ने सदन में सरकार को घेरते हुए पूछा कि क्या प्रदेश में योग्य और मेधावी लोगों की इतनी कमी हो गई है कि अधिकांश विश्वविद्यालयों में बाहर के लोगों को कुलपति बनाया जा रहा है?
प्रश्नकाल के दौरान चंद्राकर ने सीधे उच्च शिक्षा मंत्री पर निशाना साधा। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि अम्बिकापुर, दुर्ग और कृषि विश्वविद्यालय को छोड़ दिया जाए, तो प्रदेश के लगभग सभी प्रमुख शिक्षण संस्थानों में दूसरे राज्यों के व्यक्तियों को शीर्ष पदों पर बैठाया गया है। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर न देने के पीछे कोई विशेष राजनीतिक दबाव है?
अजय चंद्राकर ने छत्तीसगढ़िया अस्मिता का कार्ड खेलते हुए कहा कि प्रदेश में अक्सर चुनावों के समय स्थानीयता की राजनीति की जाती है, लेकिन जब वास्तविक सम्मान और जिम्मेदारी देने की बारी आती है, तो छत्तीसगढ़ के विद्वानों को दरकिनार कर दिया जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रदेश में पढ़े-लिखे और अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध करने वाले शिक्षाविदों की कोई कमी नहीं है।
पूर्व मंत्री ने सदन में दावा किया कि वह व्यक्तिगत रूप से ऐसे दस नाम गिना सकते हैं, जिनके शोध पत्र देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और जो कुलपति बनने की पूरी योग्यता रखते हैं। उन्होंने सवाल किया कि जब राज्य में ही इतने बड़े विद्वान मौजूद हैं, तो फिर बाहर से आयातित चेहरों पर इतनी मेहरबानी क्यों दिखाई जा रही है?
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर स्थानीय बुद्धिजीवियों और प्रोफेसरों के बीच भी असंतोष देखा जा रहा है। स्थानीय शिक्षाविदों का मानना है कि राज्य की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझने वाला व्यक्ति ही यहाँ के छात्रों और शिक्षा व्यवस्था के साथ बेहतर न्याय कर सकता है।
चंद्राकर के इन तीखे सवालों के बाद सदन में काफी देर तक गहमागहमी बनी रही। इस मुद्दे ने न केवल शैक्षणिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि राज्य की राजनीति में ‘छत्तीसगढ़िया बनाम बाहरी’ की एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है। अब देखना होगा कि सरकार इन नियुक्तियों के बचाव में क्या तर्क पेश करती है।

