मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस मामले में अदालत ने साफ कर दिया कि वह किसी भी अखबार या मीडिया रिपोर्ट के आधार पर सीधे तौर पर कोई भी अंतरिम आदेश जारी नहीं कर सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट सही या गलत कुछ भी हो सकती है, इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष जानना बेहद जरूरी है।
यह पूरा कानूनी विवाद वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया और ‘फॉर्म 6’ के इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है। याचिका में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया है कि चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय है, लेकिन सीईसी ज्ञानेश कुमार पर आरोप है कि उन्होंने अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या सामूहिक चर्चा के बिना कई मामलों में एकतरफा फैसले लिए हैं।
यह विवाद तब तूल पकड़ा जब एक अंग्रेजी अखबार में यह रिपोर्ट छपी कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों के दौरान मतदाता सूची और तकनीकी प्रणालियों से जुड़े 14 से अधिक फैसलों पर अपनी औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। याचिकाओं में इन्हीं बिंदुओं को आधार बनाते हुए आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे और तुरंत हस्तक्षेप की मांग की गई थी।
सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की सुनवाई पूरी करते हुए भारत के चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ताओं की तुरंत अंतरिम आदेश पारित करने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत का मानना है कि प्रतिवादियों का पक्ष सुने बिना किसी भी तरह का आदेश देना न्यायिक प्रक्रिया के नियमों के अनुकूल नहीं होगा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के भीतर होने वाले सभी फैसले या तो पूर्ण सर्वसम्मति से या फिर बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि यदि चुनाव आयोग अपना जवाब दाखिल करने के बाद अदालत को यह संतुष्ट कर देता है कि कोई भी फैसला बिना आम सहमति के लिया गया था, तो अदालत उन पर पुनर्विचार कर सकती है या उन्हें रद्द कर सकती है।
इसके अलावा, सुनवाई के दौरान अदालत ने व्यवस्थागत सुचारू रूप से चलने को लेकर कुछ व्यावहारिक सवाल भी उठाए। पीठ ने तंज कसते हुए पूछा कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त को ही निलंबित कर दिया जाए, तो ऐसी स्थिति में निर्वाचन आयोग का कामकाज कौन संभालेगा और देश में चुनाव कौन कराएगा? अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानून सर्वोपरि है और उसका पालन होना चाहिए, लेकिन हर कदम कानूनी और तार्किक प्रक्रिया के दायरे में ही उठाया जाना चाहिए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है और अगली सुनवाई तक किसी भी प्रकार की जल्दबाजी में अंतरिम कार्रवाई करने से इनकार कर दिया है। इस मामले की अगली कार्रवाइयों और आयोग के जवाब पर अब राजनीतिक और कानूनी गलियारों की विशेष नजर टिकी हुई है।

