रायपुर/बिलासपुर, 10 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम करका की रहने वाली सुभद्रा आर्मी आज आर्थिक सशक्तिकरण की एक नई मिसाल बनकर उभरी हैं। कभी गरीबी और आर्थिक तंगी से जूझने वाली सुभद्रा ने राज्य सरकार की योजनाओं और स्वयं सहायता समूह की शक्ति को पहचानते हुए अपनी तकदीर बदल दी है। आजीविका मिशन ‘बिहान’ के माध्यम से उन्होंने न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि अब वे गर्व के साथ ‘लखपति दीदी’ के रूप में पहचानी जा रही हैं।
सुभद्रा की सफलता की यात्रा ‘माँ सरस्वती स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ने के साथ शुरू हुई। शुरुआत में खेती और संसाधनों के लिए पूंजी का अभाव था, लेकिन समूह के माध्यम से उन्हें 15 हजार रुपये का रिवाल्विंग फंड, 60 हजार रुपये का सीआईएफ (CIF) और 3 लाख रुपये का बैंक ऋण प्राप्त हुआ। इस वित्तीय सहयोग ने उन्हें खेती के लिए आवश्यक बीज, खाद और आधुनिक उपकरण जुटाने का साहस दिया। सरकारी योजनाओं से मिले इस शुरुआती प्रोत्साहन ने उनके जीवन में बदलाव की नींव रखी।
सुभद्रा ने पारंपरिक खेती के बजाय मांग को देखते हुए खीरे की खेती को अपनी आजीविका का जरिया बनाया। वर्तमान में वे 2 एकड़ जमीन पर आधुनिक कृषि पद्धतियों का उपयोग कर खीरे की पैदावार कर रही हैं। उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि वे हर दूसरे दिन लगभग 10 क्विंटल खीरा मंडी में बेच रही हैं, जिससे उन्हें औसतन 7 हजार रुपये की आय प्राप्त हो रही है। उत्पादन के इस स्तर ने उन्हें क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बना दिया है।

इस सफलता के पीछे मार्गदर्शन की भी अहम भूमिका रही है। सुभद्रा बताती हैं कि समूह की ‘बीमा सखी’ हबीबुन निशा ने उन्हें बैंकिंग प्रक्रियाओं और वित्तीय साक्षरता को समझने में काफी मदद की। सही समय पर ऋण की उपलब्धता और कृषि तकनीकी के तालमेल ने उन्हें घाटे के डर से बाहर निकाला। सुभद्रा ने मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और राज्य सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन ने उनके परिवार को एक सम्मानजनक जीवन दिया है।
आज सुभद्रा न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, बल्कि अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने और भविष्य के लिए बचत करने में भी सक्षम हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही मार्गदर्शन और संसाधनों का साथ मिले, तो वे विपरीत परिस्थितियों को मात देकर आत्मनिर्भरता का नया इतिहास रच सकती हैं। सुभद्रा की यह उपलब्धि जिले की अन्य महिलाओं को भी समूह से जुड़कर स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।

