छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित CGPSC 2021 भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को करारा झटका दिया है। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें चयनित उम्मीदवारों को तत्काल जॉइनिंग देने के निर्देश दिए गए थे। प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ‘स्पेशल लीव पिटीशन’ (SLP) दायर की थी, जिसे शीर्ष अदालत ने सुनवाई के बाद खारिज कर दिया। इस फैसले से उन अभ्यर्थियों के लिए नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है, जो पिछले तीन सालों से अपनी ज्वाइनिंग का इंतजार कर रहे थे।
अदालत में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अन्य वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि इस भर्ती प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं हुई हैं, जिसकी जांच वर्तमान में CBI कर रही है। सरकार का रुख यह था कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक नियुक्तियों को स्थगित रखा जाना चाहिए ताकि चयन प्रक्रिया की पवित्रता बनी रहे। सरकार का कहना था कि अंतिम निर्णय जांच के परिणामों के आधार पर ही लिया जाना उचित होगा।
वहीं, चयनित अभ्यर्थियों के वकीलों ने सरकार के इन तर्कों का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सीबीआई पहले ही अपनी चार्जशीट दाखिल कर चुकी है, जिसमें कुल 171 चयनित उम्मीदवारों में से केवल 5 लोगों के नाम ही संदिग्ध पाए गए हैं। अधिवक्ताओं ने यह दलील भी दी कि इसी बैच के 125 उम्मीदवारों को पहले ही जॉइनिंग दी जा चुकी है, ऐसे में शेष योग्य उम्मीदवारों को बिना किसी ठोस आधार के पिछले तीन वर्षों से सेवा से वंचित रखना पूरी तरह से अनुचित और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
इस मामले की कानूनी यात्रा काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने सीबीआई जांच के परिणामों के अधीन रहते हुए अभ्यर्थियों को जॉइनिंग देने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इसे चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में अपील की थी, लेकिन चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की बेंच ने भी सिंगल बेंच के फैसले को सही ठहराया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकार की दलीलों को अपर्याप्त मानते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर मुहर लगा दी है।
विवाद की जड़ में CGPSC 2021 की परीक्षा है, जिसमें 171 पदों के लिए भर्ती निकाली गई थी। मई 2023 में जारी चयन सूची के बाद यह आरोप लगे कि आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष और राजनीतिक रसूख वाले लोगों ने अपने रिश्तेदारों और करीबियों को डिप्टी कलेक्टर और डीएसपी जैसे उच्च पदों पर बैठाने के लिए नियमों की अनदेखी की। धांधली की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश की वर्तमान सरकार ने जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा था, जिसके बाद कई चौंकाने वाले खुलासे हुए और गिरफ्तारियां भी हुईं।
अब तक इस घोटाले में कुल 12 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जिनमें पीएससी के पूर्व अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी, पूर्व परीक्षा नियंत्रक आरती वासनिक और पूर्व सचिव जीवनलाल ध्रुव जैसे रसूखदार नाम शामिल हैं। सीबीआई ने अपनी रेड में कई आपत्तिजनक साक्ष्य बरामद किए थे और कुछ चयनित अभ्यर्थियों (जो अधिकारियों के रिश्तेदार थे) को भी सलाखों के पीछे भेजा गया है। फिलहाल ये सभी आरोपी जेल में बंद हैं और कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद अब राज्य प्रशासन को उन चयनित उम्मीदवारों को नियुक्तियां देनी होंगी जिनके नाम जांच में पाक-साफ हैं। हालांकि, ये सभी नियुक्तियां “CBI जांच के अंतिम परिणाम के अधीन” रहेंगी, जिसका अर्थ है कि यदि भविष्य में जांच के दौरान किसी और उम्मीदवार की संलिप्तता पाई जाती है, तो उसकी सेवा समाप्त की जा सकेगी। यह फैसला उन सैकड़ों युवाओं के लिए न्याय की जीत मानी जा रही है जिन्होंने अपनी मेहनत से यह मुकाम हासिल किया था।

