28 फरवरी 2026 की सुबह 9:45 बजे घड़ी की सुइयां जैसे ही एक साथ आईं, मध्य पूर्व का इतिहास हमेशा के लिए बदल गया। अचानक आसमान आग के गोलों से भर गया और तेहरान से लेकर बंदर अब्बास तक ईरान के प्रमुख शहर भीषण धमाकों से दहल उठे। यह संयुक्त अमेरिका-इजराइल ऑपरेशन की शुरुआत थी, जिसमें 100 से अधिक अमेरिकी विमानों और 200 इजराइली जेट्स ने मिलकर मात्र 12 घंटों के भीतर 900 से अधिक हवाई हमले किए। 1,000 से ज्यादा रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाकर ईरान की टॉप लीडरशिप और सैन्य ढांचे को हिला कर रख दिया गया।
जंग के पहले ही हफ्ते में हालात बेकाबू हो गए जब ईरान ने अपने ‘विनाशकारी पलटवार’ की शुरुआत की। हजारों की संख्या में मिसाइलें और ड्रोन इजराइली शहरों और अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर दागे गए। हालांकि ‘आयरन डोम’ और ‘एरो’ डिफेंस सिस्टम ने कई खतरों को टाला, लेकिन हमलों की तीव्रता इतनी अधिक थी कि कई जगहों पर भारी तबाही मची। इसी बीच लेबनान से हिज़्बुल्लाह के युद्ध में कूदने के बाद इस संघर्ष ने एक क्षेत्रीय महायुद्ध का रूप ले लिया, जिससे लाखों लोग बेघर हो गए और मौतों का आंकड़ा हजारों पार कर गया।
इस युद्ध का सबसे घातक प्रहार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ के बंद होते ही दुनिया भर में तेल की सप्लाई ठप हो गई। समुद्र के बीचों-बीच जहाजों के पहिए थम गए और ऊर्जा संकट ने विकसित देशों की भी सांसें रोक दीं। शेयर बाजार धराशायी हो गए और आम जनता के लिए बुनियादी जरूरतें पूरी करना एक चुनौती बन गया। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह आधुनिक युग का सबसे बड़ा ‘इकोनॉमिक शॉक’ है, जिससे उबरने में दशकों लग सकते हैं।
राजनीतिक गलियारों में भी इस जंग ने भारी उथल-पुथल मचा दी है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़े शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि जब तक मिशन पूरी तरह सफल नहीं हो जाता, हमले जारी रहेंगे। दूसरी ओर, ईरान की ज़िद और पलटवार की नीति ने युद्धविराम की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। आज 30 दिन बीत जाने के बाद भी पूरी दुनिया सिर्फ एक ही सवाल पूछ रही है—क्या यह मानवता के अंत की शुरुआत है या कहीं से शांति की कोई किरण फूटेगी? फिलहाल, बारूद के धुएं के बीच भविष्य धुंधला नजर आ रहा है।

