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    क्लाइमेट चेंज का डरावना सच: ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से गायब हुई 11.3 लाख करोड़ मीट्रिक टन बर्फ, तेजी से बढ़ रहा समुद्र का जलस्तर

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharySeptember 17, 2026283 Views
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    हाल ही में विज्ञान पत्रिका ‘साइंटिफिक डेटा’ में छपी एक बड़ी और चौंकाने वाली वैज्ञानिक रिपोर्ट ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के नेतृत्व में किए गए इस व्यापक अध्ययन के अनुसार, हमारी धरती तेजी से गर्म हो रही है, जिसका सबसे बुरा असर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर पड़ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि साल 1979 से लेकर अब तक ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के ग्लेशियरों से 12.5 ट्रिलियन टन यानी करीब 11.3 लाख करोड़ मीट्रिक टन बर्फ पिघल चुकी है। यह बर्फ इतनी ज्यादा है कि अगर इसे पूरे अमेरिका महाद्वीप पर फैला दिया जाए, तो वहां पांच फीट गहरी बर्फ की चादर बिछ जाएगी।

    इस विशाल बर्फ के पिघलने से पैदा हुआ पानी लगभग तीन क्वाड्रिलियन गैलन यानी 11.3 क्वाड्रिलियन लीटर पानी में बदल चुका है। इसकी वजह से साल 1979 से अब तक दुनिया भर में समुद्र का जलस्तर करीब 1 इंच यानी 3.1 सेंटीमीटर बढ़ चुका है। नार्थुम्ब्रिया यूनिवर्सिटी की आइस साइंटिस्ट और इस स्टडी की मुख्य लेखिका इनेस ओतोसाका के मुताबिक, सुनने में 1 इंच का यह आंकड़ा बहुत छोटा लग सकता है, लेकिन इसके परिणाम बेहद भयानक हैं। समुद्र का स्तर हर एक तिहाई इंच बढ़ने पर दुनिया भर में 20 से 30 लाख लोग ऐसे हैं जिनके घरों और इलाकों में हर साल कम से कम एक बार बाढ़ आने का खतरा पैदा हो जाता है।

    आम तौर पर लोगों को लगता है कि हवा गर्म होने से बर्फ पिघल रही है, लेकिन यह स्टडी इससे बिल्कुल अलग सच सामने लाती है। रिपोर्ट बताती है कि इस पिघलाव का पांचवां और छठा हिस्सा ऊपर की गर्म हवा की वजह से नहीं, बल्कि समुद्र के गर्म पानी की वजह से हो रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि गर्म पानी नीचे और किनारों से बर्फ की परतों को लगातार काट रहा है, जिससे ग्लेशियर टूटकर तेजी से महासागरों में बह रहे हैं। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी जोर दिया गया है कि ग्रीनलैंड का जकोबशवन ग्लेशियर अब एक दिन में 164 फीट यानी 50 मीटर तक पीछे खिसक रहा है।

    अध्ययन से यह भी पता चलता है कि 1970, 1980 और 1990 के दशकों में बर्फ की ये परतें काफी हद तक स्थिर थीं। इसके बाद 2010 के दशक में बर्फ पिघलने की रफ्तार तेजी से बढ़ी और इसने एक विकराल रूप ले लिया। बीच में तीन साल यानी 2020 से 2023 के दौरान मौसम में बदलाव के कारण बर्फ पिघलने की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी थी। हालांकि, साल 2023 के बाद आंकड़े देखने पर पता चला है कि बर्फ के तेजी से पिघलने का यह खतरनाक ट्रेंड फिर से शुरू हो चुका है। इस दौरान अंटार्कटिका में कुछ स्थिरता इसलिए बनी रही क्योंकि पूर्वी अंटार्कटिका में रिकॉर्ड बर्फबारी हुई थी, जिसने पश्चिमी अंटार्कटिका में हो रहे तेजी से नुकसान की कुछ भरपाई कर दी थी।

    स्टडी से जुड़े यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिक एरिक रिग्नोट का कहना है कि अब खतरा बिल्कुल साफ है और इसे टाला नहीं जा सकता। वहीं, न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के आइस साइंटिस्ट डेविड हॉलैंड ने चेतावनी दी है कि ज्यादातर बर्फ का नुकसान डायनेमिक यानी तेजी से होने वाली हलचल के तरीकों से हो रहा है, जो किसी भी वक्त विनाशकारी ढहने की स्थिति को जन्म दे सकता है। दूसरी तरफ वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग का असर दशकों बाद इन ग्लेशियरों पर पूरी तरह दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि अगर आज हम धरती को गर्म होने से रोक भी लें, तब भी आने वाले कई दशकों तक यह खतरनाक पिघलाव आसानी से थमेगा नहीं।

    समुद्र के जलस्तर में हो रही इस लगातार वृद्धि का सबसे बड़ा और सीधा खतरा तटीय क्षेत्रों में बसने वाली आबादी और छोटे द्वीपीय देशों पर मंडरा रहा है। दुनिया के कई बड़े महानगर और घनी आबादी वाले शहर समुद्र के किनारे बसे हैं, जो आने वाले समय में पानी में डूबने की कगार पर आ सकते हैं। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से इन इलाकों में बाढ़ का खतरा तो बढ़ेगा ही, साथ ही उपजाऊ भूमि भी खारे पानी की चपेट में आ जाएगी। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर के करोड़ों लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

    समुद्र के जलस्तर पर पड़ने वाले प्रभाव के अलावा, ध्रुवों की बर्फ का इस तरह पिघलना वैश्विक मौसम चक्र को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। ध्रुवीय क्षेत्र पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने वाले एक विशाल रेफ्रिजरेटर की तरह काम करते हैं और जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो महासागरीय धाराएं बाधित हो जाती हैं। इससे दुनिया भर में मानसूनी पैटर्न बदल रहा है, जिससे कभी सूखा तो कभी बेमौसम भारी बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाएं आम हो रही हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि समय रहते कार्बन उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए इस पर्यावरणीय संकट से निपटना असंभव हो जाएगा।

    Brijesh Choudhary
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