पश्चिम एशिया में एक बार फिर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से हरी झंडी मिलते ही अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ एक बड़े और व्यापक सैन्य अभियान की पूरी तैयारी कर ली है। पेंटागन के सूत्रों का दावा है कि आदेश मिलते ही मात्र 96 घंटे (4 दिन) के भीतर इस तबाही मचाने वाले अभियान को अमलीजामा पहनाया जा सकता है।
इस संभावित सैन्य कार्रवाई की योजना बेहद आक्रामक और व्यापक बताई जा रही है। पेंटागन और यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) द्वारा तैयार किए गए ब्लूप्रिंट के मुताबिक, इस बार केवल छिटपुट ठिकानों को नहीं, बल्कि ईरान के रणनीतिक सैन्य प्रतिष्ठानों, रडार नेटवर्क, मिसाइल लॉन्चर्स और कमांड सेंटर्स को निशाना बनाया जाएगा। इसके अलावा, ईरान की परमाणु सुविधाएं और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाला ऊर्जा बुनियादी ढांचा (Energy Infrastructure) भी इस टारगेट लिस्ट में शामिल है।
सैन्य स्तर पर अमेरिका की यह तैयारी इस बात का संकेत है कि पश्चिम एशिया में वॉशिंगटन की सैन्य मशीनरी किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। इस समय मध्य पूर्व के सामरिक क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में अमेरिकी युद्धपोत, फाइटर जेट्स और सैन्य बल तैनात हैं। जानकारों का कहना है कि ये संपत्तियां पलक झपकते ही ईरान के भीतर गहरे लक्ष्यों पर सटीक हमले करने की पूरी क्षमता रखती हैं।
हालांकि, ऑपरेशनल तैयारियां पूरी होने के बावजूद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से अभी तक अंतिम और औपचारिक आदेश जारी नहीं किया गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन इस संवेदनशील फैसले को लेकर बेहद नपतुले कदम उठा रहा है। हालांकि वे पहले भी कई बार सैन्य कार्रवाई के मुहाने पर पहुंचकर अंतिम क्षणों में पीछे हटने का जोखिम उठा चुके हैं, इसलिए इस बार भी अंतिम समय में कूटनीतिक रुख अपनाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने इस कार्रवाई के संभावित और खतरनाक परिणामों को लेकर भी पहले ही चेतावनी जारी कर दी है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, यदि अमेरिका या उसके सहयोगी इजरायल की ओर से ईरान पर कोई बड़ा सैन्य प्रहार किया जाता है, तो ईरान चुप नहीं बैठेगा। तेहरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगी, विशेषकर यमन के हूती विद्रोही और अन्य प्रॉक्सी नेटवर्क, तुरंत और आक्रामक पलटवार कर सकते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अनियंत्रित अराजकता फैल सकती है।
इस संभावित संघर्ष की आहट से वैश्विक स्तर पर गहरी चिंताएं पैदा हो गई हैं। मध्य पूर्व में अमेरिकी नागरिकों, सैन्य अड्डों और दूतावासों की सुरक्षा को लेकर हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। क्षेत्रीय देशों और यूरोपीय सहयोगियों की ओर से भी लगातार कूटनीतिक प्रयास किए जा रहे हैं ताकि इस विस्फोटक स्थिति को बातचीत के जरिए टाला जा सके और एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध को रोका जा सके।

