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    Home»क्राइम»सथानकुलम कांड: हेड कांस्टेबल रेवती की बहादुरी ने दिलाया पिता-पुत्र को न्याय, 9 पुलिसकर्मियों को फांसी
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    सथानकुलम कांड: हेड कांस्टेबल रेवती की बहादुरी ने दिलाया पिता-पुत्र को न्याय, 9 पुलिसकर्मियों को फांसी

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharyApril 9, 2026340 Views
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    तमिलनाडु के बहुचर्चित सथानकुलम कस्टोडियल मौत मामले में करीब छह साल के लंबे इंतजार के बाद अदालत ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। अदालत ने इस बर्बर कांड में शामिल 9 पुलिसकर्मियों को दोषी करार देते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई है। यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए एक नजीर माना जा रहा है, जिसने यह स्पष्ट कर दिया है कि रक्षक अगर भक्षक बन जाए, तो कानून उसे किसी भी कीमत पर नहीं बख्शेगा। इस पूरे मामले को अंजाम तक पहुंचाने और दोषियों को उनके किए की सजा दिलाने में हेड कांस्टेबल रेवती की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक रही है।

    यह हृदयविदारक घटना साल 2020 की है, जब पूरा देश कोविड-19 महामारी के दौर से गुजर रहा था। तूतीकोरिन जिले के सथानकुलम में रहने वाले पी. जयाराज और उनके बेटे जे. बेन्निक्स को पुलिस ने सिर्फ इसलिए हिरासत में लिया था क्योंकि उन्होंने अपनी मोबाइल की दुकान तय समय से थोड़ी देर ज्यादा खुली रखी थी। इस मामूली उल्लंघन के बदले पुलिस स्टेशन के भीतर जो कुछ भी हुआ, उसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया। पुलिस हिरासत में पिता और पुत्र को घंटों तक अमानवीय यातनाएं दी गईं, जिसके चलते अस्पताल ले जाते समय उनकी मृत्यु हो गई।

    प्रारंभ में पुलिस प्रशासन ने इस मामले को दबाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन हेड कांस्टेबल रेवती ने व्यवस्था की दीवार को तोड़ते हुए सच बोलने का साहस दिखाया। रेवती उस काली रात सथानकुलम पुलिस स्टेशन में ड्यूटी पर तैनात थीं और उन्होंने अपनी आंखों से वह सब देखा जो शायद ही कोई इंसान देख सके। न्यायिक मजिस्ट्रेट एमएस भारथिदासन के सामने जब पुलिस विभाग अपने ही कर्मचारियों को बचाने की कोशिश कर रहा था, तब रेवती ने आगे आकर कहा कि वह सब कुछ सच बताएंगी। हालांकि, दो छोटी बच्चियों की मां होने के नाते उनके मन में अपनी सुरक्षा और नौकरी को लेकर गहरा डर भी था।

    रेवती की गवाही किसी दहला देने वाली कहानी से कम नहीं थी। उन्होंने अदालत को बताया कि पुलिसकर्मियों ने जयाराज और बेन्निक्स को लाठियों और जूतों से इतनी बेरहमी से पीटा कि स्टेशन की दीवारें उनकी चीखों से गूंज उठी थीं। उन्होंने बताया कि आरोपी पुलिसकर्मी बीच-बीच में शराब पीने के लिए रुकते थे और फिर दुगनी क्रूरता के साथ पिता-पुत्र पर हमला करते थे। जब रेवती रात करीब 8:50 बजे स्टेशन पहुंचीं, तो उन्होंने बेन्निक्स को “अम्मा, मुझे छोड़ दो, बहुत दर्द हो रहा है” कहते हुए चिल्लाते सुना था।

    गवाही के दौरान रेवती ने वह खौफनाक मंजर भी बयां किया जब गंभीर रूप से घायल पिता-पुत्र से ही उनके शरीर से निकले खून को फर्श से साफ कराया गया। उन्होंने बताया कि किस तरह दोनों को निर्वस्त्र कर उनके हाथ बांध दिए गए और उनके निजी अंगों पर प्रहार किया गया। इस बर्बरता को देखकर रेवती खुद को संभाल नहीं पाई थीं और रोते हुए कमरे से बाहर चली गई थीं। उनके बयान ने साबित कर दिया कि यह मौत प्राकृतिक नहीं, बल्कि सोची-समझी हत्या थी, जो कानून के रखवालों ने की थी।

    पूरे मामले के दौरान रेवती पर अपने ही साथियों का भारी दबाव था और उन्हें लगातार धमकियां मिल रही थीं। इसके बावजूद, वह अपने बयान से पीछे नहीं हटीं और सीसीटीवी फुटेज के जरिए एक-एक अपराधी की पहचान की। उनकी इस दृढ़ता का परिणाम रहा कि आज नौ पुलिसकर्मी फांसी के फंदे तक पहुंच गए हैं। रेवती का यह कदम पुलिस विभाग के भीतर छिपी गंदगी को साफ करने की दिशा में एक दुर्लभ उदाहरण है, जहाँ एक कनिष्ठ अधिकारी ने ताकतवर सहयोगियों के खिलाफ जाकर सत्य का साथ दिया।

    यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार के जख्मों पर मरहम लगाने जैसा है, बल्कि देश की पुलिस व्यवस्था के लिए भी एक कड़ा संदेश है। सथानकुलम मामले ने पुलिस सुधारों की आवश्यकता को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। रेवती की बहादुरी ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि एक व्यक्ति भी सच्चाई पर अडिग रहे, तो न्याय की जीत निश्चित है। आज पूरा देश रेवती के साहस को सलाम कर रहा है, जिनकी वजह से जयाराज और बेन्निक्स की आत्मा को आखिरकार शांति मिल सकी।

    Brijesh Choudhary
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