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    तेलंगाना में ‘पैरेंटल सपोर्ट बिल’ पास: बुजुर्ग माता-पिता को बेसहारा छोड़ा तो MP-MLA से लेकर प्राइवेट कर्मचारियों तक की कटेगी सैलरी

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharyMarch 30, 2026416 Views
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    तेलंगाना: सरकार ने समाज में बुजुर्गों के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता को देखते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा ‘पैरेंटल सपोर्ट बिल’ (माता-पिता सहायता विधेयक) विधानसभा में पेश किया है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य उन बच्चों को कानूनी रूप से जवाबदेह बनाना है, जो अपने माता-पिता को बुढ़ापे में बेसहारा छोड़ देते हैं या उनकी बुनियादी जरूरतों का ख्याल नहीं रखते। सदन में इस बिल को पेश करते हुए मुख्यमंत्री काफी भावुक नजर आए और उन्होंने कहा कि जिस देश में माता-पिता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, वहां ऐसे कानून की जरूरत पड़ना दुखद है, लेकिन आज की सामाजिक परिस्थितियों में यह अनिवार्य हो गया है।

    इस कानून का सबसे कड़ा और प्रभावी प्रावधान सरकारी कर्मचारियों के वेतन से सीधे जुड़ा है। यदि कोई कर्मचारी अपने माता-पिता की देखरेख करने में विफल रहता है, तो सरकार उसके मासिक वेतन का एक निश्चित हिस्सा (अनुमानित 5% से 10%) काट लेगी। यह राशि सीधे पीड़ित माता-पिता के बैंक खाते में जमा कर दी जाएगी, ताकि उन्हें अपने जीवनयापन या दवाओं के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े और न ही लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़े।

    विधेयक की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह है कि केवल सरकारी कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। इस विधेयक के दायरे में सरकारी और निजी (प्राइवेट) सेक्टर के कर्मचारियों के साथ-साथ विधायक, सांसद और यहाँ तक कि सरपंचों को भी जवाबदेह बनाया गया है। यदि कोई जनप्रतिनिधि अपने माता-पिता की उपेक्षा करता पाया जाता है, तो उनके वेतन, भत्तों या पेंशन से भी कटौती की जाएगी। सरकार ने इस प्रावधान के जरिए यह स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून की नजर में सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी सबके लिए समान है, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो।

    इस कानून की सबसे बड़ी खूबी इसकी सरल और प्रभावी प्रक्रिया है, जिसमें बुजुर्ग माता-पिता को न्याय के लिए अदालतों के चक्कर नहीं काटने होंगे। अब उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि वे अपनी शिकायत लेकर सीधे जिला कलेक्टर के पास आवेदन कर सकेंगे। शिकायत प्राप्त होने पर जिला कलेक्टर मामले की त्वरित जांच करेंगे और यदि शिकायत सही पाई जाती है, तो उनके पास सीधे आदेश जारी करने की शक्ति होगी। कलेक्टर संबंधित कंपनी, विभाग या सरकारी दफ्तर को निर्देश देंगे कि आरोपी कर्मचारी की सैलरी से एक निश्चित हिस्सा काटकर सीधे माता-पिता के बैंक खाते में जमा किया जाए। यह सीधा हस्तांतरण सुनिश्चित करेगा कि बुजुर्गों को समय पर दवा, भोजन और गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता मिलती रहे। यह प्रावधान बुजुर्गों को मानसिक तनाव और आर्थिक बोझ से बचाने के लिए किया गया है।

    मुख्यमंत्री ने इस दौरान समाज में तेजी से खुल रहे वृद्धाश्रमों पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में युवा पीढ़ी अपने संस्कारों और जड़ों को भूलती जा रही है, जिसके कारण बुजुर्गों को उनके ही घरों में उपेक्षित जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ता है। यह कानून न केवल एक दंडात्मक कार्रवाई है, बल्कि समाज के गिरते नैतिक मूल्यों को कानूनी रूप से सहारा देने की एक कोशिश है ताकि कोई भी बुजुर्ग बेसहारा महसूस न करे।

    तेलंगाना का यह मॉडल असम सरकार के ‘प्रणाम’ (PRANAM) एक्ट से प्रेरित है, जिसे अब और अधिक सशक्त रूप में लागू किया जा रहा है। सरकार का मानना है कि जब तक आर्थिक दंड का प्रावधान नहीं होगा, तब तक कई लोग अपनी जिम्मेदारियों से भागते रहेंगे। इस ऐतिहासिक कदम के बाद अब अन्य राज्यों में भी इसी तरह के कड़े कानूनों की मांग उठने लगी है ताकि वरिष्ठ नागरिकों को उनके जीवन के अंतिम पड़ाव पर सम्मान और सुरक्षा मिल सके।

    Brijesh Choudhary
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