देश की राजनीति में इन दिनों परिसीमन संशोधन विधेयक (Delimitation Amendment Bill) और महिला आरक्षण से जुड़े संभावित विधायी प्रस्तावों को लेकर सरगर्मी अपने चरम पर है। चर्चा है कि मोदी सरकार इस महीने संसद का विशेष सत्र बुलाकर संविधान (131वां संशोधन) बिल, परिसीमन (संशोधन) बिल और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल को पारित कराने की पूरी कोशिश कर सकती है। इस संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दे को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच सियासी पत्र युद्ध भी तेज हो गया है।
इसी सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चौथी बार पत्र लिखा। अपने पत्र में खरगे ने मांग की कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बावजूद दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि संसद में कोई भी नया संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश करने से पहले सरकार को बिना किसी जल्दबाजी के सभी दलों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के लिए सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए।
खरगे के इस पत्र का कड़ा जवाब देते हुए केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय महत्व के इस विषय पर सरकार पहले से ही विभिन्न दलों के साथ औपचारिक और अनौपचारिक स्तर पर संवाद कर रही है। रिजिजू ने बताया कि सदन की बैठक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद उसका सत्रावसान करने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं होती है। उन्होंने कहा कि प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस से भी कई मौकों पर संपर्क किया गया है, और मानसून सत्र के दौरान उन्होंने खुद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से व्यक्तिगत रूप से मिलकर इस पर चर्चा की थी और सहयोग मांगा था।
रिजिजू ने अपने पत्र में खुलासा किया कि मोदी सरकार ने इस विधायी कार्य के लिए कांग्रेस के अलावा कई ताकतवर क्षेत्रीय दलों के प्रमुख नेताओं के साथ सीधा संपर्क और विचार-विमर्श किया है। सरकार ने एम.के. स्टालिन (DMK), नवीन पटनायक (BJD), उद्धव ठाकरे (Shiv Sena – UBT), वाईएस जगन मोहन रेड्डी (YSRCP) के साथ-साथ समाजवादी पार्टी, एआईएमआईएम और एनसीपी जैसे दलों के प्रतिनिधियों के साथ भी बातचीत की है। यही कारण है कि सरकार का मानना है कि जब विभिन्न क्षेत्रीय दलों से लगातार परामर्श किया जा रहा है, तो बार-बार सर्वदलीय बैठक की मांग दोहराना तार्किक नहीं है।
संसद के दोनों सदनों में अंकगणित (नंबर गेम) की मजबूरी इस पूरी रणनीति के केंद्र में है। लोकसभा में 543 में से 3 सीटें खाली हैं, और विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी लगभग 360 वोटों की आवश्यकता होती है। वर्तमान में एनडीए के पास 318 सांसद हैं, और यदि डीएमके के 22 सांसद भी समर्थन कर दें तो आंकड़ा 340 तक पहुंचता है, जिसके बाद भी भाजपा को सुरक्षित बहुमत के लिए करीब 20 और सांसदों की जरूरत पड़ेगी।
उच्च सदन यानी राज्यसभा का समीकरण भी इसी तरह की अतिरिक्त जोड़-तोड़ की मांग करता है। राज्यसभा की 245 सीटों में से 3 खाली हैं और 240 सदस्यों के सदन में एनडीए के पास 153 सांसद हैं, जबकि बहुमत के लिए 162 सांसदों की आवश्यकता है। यहां भी विधायी संशोधनों को पार कराने के लिए सरकार को छोटी पार्टियों और क्षेत्रीय दलों के कम से कम 9 अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की सख्त जरूरत पड़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण भारत के कई राज्य इस बात से सशंकित हैं कि बेहतर परिवार नियोजन और विकास कार्यों के कारण उनकी लोकसभा सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि क्षेत्रीय दल बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और सरकार इन क्षत्रपों को साधने में जुटी है।
यदि मोदी सरकार इन प्रमुख क्षेत्रीय दलों को अपने पाले में या तटस्थ रखने में सफल होती है, तो कांग्रेस के कड़े विरोध के बावजूद इस बड़े संवैधानिक और परिसीमन सुधार को संसद में आसानी से अंजाम दिया जा सकेगा। किरेन रिजिजू के इस पत्र के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार सचमुच इस महीने विशेष सत्र बुलाकर इन विधेयकों को पारित कराने का दांव चलती है या नहीं।

